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श्रीलंका में सांसदों की पेंशन खत्म, राष्ट्रपति अनुरा कुमार दिसानायके का बड़ा फैसला—क्या भारत में भी हो ऐसा?

श्रीलंका सरकार का यह फैसला निश्चित रूप से बहस और आत्ममंथन का विषय बन गया है।
राष्ट्रपति अनुरा कुमार दिसानायके की सरकार ने लगभग 49 साल पुराने कानून को खत्म कर यह स्पष्ट संदेश दिया है कि राजनीति सेवा का माध्यम होनी चाहिए, सुविधा का नहीं। संसद में न्याय मंत्री हर्षना नानायक्कारा का बयान भी काफी सख्त और प्रतीकात्मक माना जा रहा है।
भारत के संदर्भ में सोचें तो…
भारत में सांसदों और विधायकों को:
वेतन
भत्ते
और रिटायरमेंट के बाद पेंशन
जैसी सुविधाएं मिलती हैं। आलोचकों का कहना है कि
👉 एक बार चुने जाने पर जीवनभर पेंशन
👉 कम समय के कार्यकाल के बाद भी सुविधाएं
आम जनता को खटकती हैं, खासकर तब जब देश का बड़ा वर्ग सामाजिक सुरक्षा से वंचित है।
पेंशन बंद करने के पक्ष में तर्क
राजनीति को सेवा-भाव से जोड़ना
करदाताओं के पैसे पर बोझ कम होना
“नेता” बनने को लाभ का साधन मानने की सोच पर रोक
विरोध में तर्क
अनुभवी नेताओं को भविष्य की सुरक्षा
ईमानदार लेकिन साधनहीन लोगों के लिए राजनीति में आना मुश्किल
सुधार की जरूरत है, पूर्ण समाप्ति नहीं
निष्कर्ष
श्रीलंका का फैसला एक कड़ा लेकिन प्रतीकात्मक कदम है। भारत में भी शायद
👉 पेंशन की शर्तें कड़ी करना,
👉 एक से अधिक पेंशन पर रोक,
👉 या न्यूनतम कार्यकाल अनिवार्य करना
जैसे सुधार ज्यादा व्यावहारिक हो सकते हैं।
अब सवाल आपसे 👇
क्या आपको लगता है कि भारत में भी सांसदों और विधायकों की पेंशन पूरी तरह खत्म होनी चाहिए, या सिर्फ उसमें सुधार किया जाना चाहिए?

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