
"सब तेरा है, सब मेरा है... पर सच तो ये है कि अब सब 'उनका' है!"
— डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा, भोपाल
आज के भारत की कड़वी हकीकत को अगर चंद लाइनों में समेटा जाए, तो दृश्य कुछ ऐसा है:
दो गुजराती 'बेच' रहे हैं,
दो गुजराती 'खरीद' रहे हैं!
और बाकी 140 करोड़ देशवासी? हम वर्गों, जातियों और नारों के खांचों में इतने गहरे धंस चुके हैं कि हमें अपने पैरों के नीचे से खिसकती जमीन का अहसास तक नहीं है।
हमारी विडंबना देखिए:
एक तरफ 'अंधभक्ति' का चश्मा चढ़ाए लोग ताली और थाली बजाने में मदहोश हैं, तो दूसरी तरफ खुद को 'बहुजन हितैषी' कहने वाले जय भीम-जय मीम के नारों के शोर में जमीनी हकीकत भूल चुके हैं।
जब हम आपस में लड़ रहे होते हैं—जाति के नाम पर, धर्म के नाम पर, आरक्षण के नाम पर—ठीक उसी वक्त देश की संपत्ति, संसाधन और भविष्य चुपचाप दो तिजोरियों की ओर मोड़ा जा रहा है।
वह मशहूर गजल याद आती है:
"ये धरती मेरी है, ये पर्वत मेरे हैं..."
सुनने में तो यह बहुत गौरवशाली लगता है, लेकिन हकीकत यह है कि कागजों पर अब 'मेरा' और 'आपका' कुछ बचा ही नहीं। सब कुछ कॉरपोरेट की जागीर बनता जा रहा है।
सोचने वाली बात:
क्या हम केवल झंडे ढोने के लिए पैदा हुए हैं? क्या हमारी नियति केवल शोर मचाना और एक-दूसरे को नीचा दिखाना रह गई है? जब तक हम इन नकली विवादों से ऊपर उठकर यह नहीं देखेंगे कि देश की आर्थिक लगाम किसके हाथ में है, तब तक हम सिर्फ दर्शक बने रहेंगे।
जागिए! इससे पहले कि पूरा देश 'लीज़' पर चला जाए।