
दोगलेपन की कुल्हाड़ी: जब 'जातिवाद' के खिलाफ लड़ने वालों ने ही दलित दूल्हे की गर्दन काट दी!
— डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा, भोपाल:
नई दिल्ली/ब्यूरो: समाज में समानता और भाईचारे का ढोंग रचने वाले चेहरों के पीछे छिपी नफरत की एक और खौफनाक तस्वीर सामने आई है। खुद को जातिवाद का पीड़ित बताने वाले और दिन-रात दूसरों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले कुछ लोगों ने साबित कर दिया है कि उनके भीतर भी वही संकीर्णता और हिंसा बसी है, जिसका वे विरोध करने का दावा करते हैं।
प्रेम का 'रक्तचरित्र' ताजा मामला अंतर-जातीय विवाह से जुड़ा है, जहाँ जाटव समाज की एक युवती ने वाल्मीकि समाज के युवक से प्रेम विवाह किया। खुद को तथाकथित 'बहुजन एकता' का हिस्सा बताने वाले लड़की के घरवालों को यह रिश्ता नागवार गुजरा। 'दलित एकता' का नारा तब दम तोड़ गया जब लड़की के परिजनों ने धोखे से बुलाकर वाल्मीकि युवक की गर्दन कुल्हाड़ी से काट दी।
कहाँ गए वो 'बहुजन चिंतक' और न्याय के पैरोकार? इस घटना ने सोशल मीडिया पर सक्रिय उन चिंतकों की चुप्पी पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं, जो अक्सर सवर्णों को निशाने पर लेकर 'जातिवाद' पर लंबे-चौड़े भाषण देते हैं।
• सवाल यह है: क्या न्याय की मांग केवल तभी होगी जब आरोपी किसी ऊंची जाति का हो?
• सवाल यह है: जब दलित समाज की एक उप-जाति दूसरी उप-जाति का खून बहाती है, तब 'क्रांति' के झंडे क्यों झुक जाते हैं?
• सच्चाई का आईना: क्या यादव, प्रजापति, पटेल या अन्य पिछड़ी जातियां आपस में विवाह स्वीकार करती हैं? कड़वा सच यही है कि हर समाज अपनी-अपनी चारदीवारी में कैद है, लेकिन दोष मढ़ने के लिए केवल एक वर्ग को चुना जाता है।
निष्कर्ष: दिखावे की राजनीति और जमीनी हकीकत: दूसरों की बेटियों पर अभद्र टिप्पणी करने और उन्हें अपने 'समाज' में लाने का दावा करने वाले कट्टरपंथियों को यह घटना आईना दिखाती है। यह हत्या केवल एक युवक की नहीं, बल्कि उस खोखले दावे की है जो कहता है कि हम जातिवाद मिटाना चाहते हैं। सच तो यह है कि यह 'जहर' हर उस व्यक्ति के भीतर है जो अपनी बेटी की पसंद को अपनी झूठी आन-बान और शान के आगे कुर्बान कर देता है।
"जब तक हम अपनी कमियों को स्वीकार नहीं करेंगे और अपनों के बीच की ऊंच-नीच खत्म नहीं करेंगे, तब तक दूसरों को दोष देना केवल एक राजनीतिक पाखंड बना रहेगा।"