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* विलंब से विवाह: प्रभावित भविष्य *

जयशंकर सिंह भदौरिया
स्वतंत्र पत्रकार, बांका (बिहार)
बांका,19 फरवरी 2026:आज के आधुनिक समाज में विवाह की आयु निरंतर बढ़ती जा रही है। शिक्षा, कैरियर निर्माण, आर्थिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत आकांक्षाओं की पूर्ति के कारण युवाओं का झुकाव देर से शादी करने की ओर बढ़ा है।यह प्रवृत्ति एक ओर जहां आत्मनिर्भरता और परिपक्वता का प्रतीक मानी जाती है, वहीं दूसरी ओर इसके सामाजिक और भावनात्मक प्रभाव भी गहरे होते जा रहे हैं।
विलंब से विवाह का सबसे बड़ा प्रभाव पारिवारिक संरचना पर पड़ता है।देर से शादी करने वाले दंपत्ति अक्सर सीमित संतान या संतान न होने के विकल्प को चुनते हैं जिससे पारंपरिक संयुक्त परिवार की अवधारणा कमजोर होती जा रही है। इसके साथ ही बढ़ती उम्र के कारण स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं जैसे गर्भधारण में कठिनाई भी भविष्य को प्रभावित करती हैं।
सामाजिक स्तर पर भी यह प्रवृत्ति रिश्तों की स्थिरता को चुनौती देती है। बढ़ती स्वतंत्रता और आत्मकेंद्रित जीवन शैली के कारण समझौते की भावना कम होती है जिससे वैवाहिक जीवन में सामंजस्य स्थापित करना कठिन हो सकता है। इसके अलावा अकेलेपन की भावना और भावनात्मक असुरक्षा भी देर से विवाह करने वालों के जीवन में देखने को मिलती है।
हालांकि देर से विवाह के साकारात्मक पक्ष भी हैं। परिपक्व सोच, आर्थिक स्थिरता और जीवन के प्रति स्पष्ट दृष्टिकोण वैवाहिक जीवन को अधिक सुदृढ़ बना सकते हैं। इसलिए आवश्यक है कि व्यक्ति समय और परिस्थिति के अनुसार संतुलन बनाते हुए निर्णय ले, ताकि उसका भविष्य न केवल सुरक्षित बल्कि संतोषजनक भी बन सके।

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