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मेरिट का शंखनाद: क्या आरक्षण की बैसाखियां प्रतिभा का मुकाबला कर पाएंगी?

डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा, भोपाल की कलम से:

शिक्षा के क्षेत्र में जब भी योग्यता और अवसर की बहस छिड़ती है, तो आंकड़े सबसे बड़ी गवाही देते हैं। हाल ही में जारी जेईई मेन्स 2026 के परिणामों की यह सूची केवल नाम और नंबरों का संग्रह नहीं है, बल्कि उन लोगों के लिए एक कड़ा जवाब है जो योग्यता को जातिगत समीकरणों के तराजू में तौलने की कोशिश करते हैं।
100 परसेंटाइल: सिर्फ मेहनत की भाषा: इस सूची पर नज़र डालें तो एक बात शीशे की तरह साफ हो जाती है—प्रतिभा किसी सरकारी संरक्षण या मुफ्त सुविधाओं की मोहताज नहीं होती। टॉपर्स की इस लिस्ट में सामान्य श्रेणी के छात्रों का दबदबा यह साबित करता है कि संसाधनों के अभाव और व्यवस्था की बेरुखी के बावजूद, सवर्ण समाज के युवाओं ने अपनी मेहनत और मेधा के दम पर सर्वोच्च स्थान हासिल किया है।
सुविधाओं का अंबार बनाम सवर्णों का संघर्ष :एक तरफ सरकारें वोट बैंक की राजनीति के चलते कुछ विशेष वर्गों के लिए मुफ्त कोचिंग, शून्य फीस और किताबों का अंबार लगा रही हैं, वहीं दूसरी ओर सामान्य वर्ग का छात्र, चाहे वह कितना ही निर्धन क्यों न हो, तंत्र की नजरों में उपेक्षित रहता है। यह विडंबना ही है कि योग्यता रखने वाले युवाओं को केवल उनके जन्म के आधार पर सुविधाओं से वंचित रखा जाता है, फिर भी वे अपनी जिद और लगन से सिस्टम को आइना दिखा रहे हैं।
"डॉ. अंबेडकर ने भी सम्मान केवल शिक्षा के बल पर पाया था। गाली देने और विरोध करने की ऊर्जा यदि शिक्षा और स्वाध्याय में लगाई जाए, तो परिणाम शायद अलग होते।"
भ्रमित नेतृत्व और समाज की जिम्मेदारी : लेख में तीखा प्रहार उन नेतृत्वकर्ताओं पर भी किया गया है जो उम्र के इस पड़ाव पर विरोधाभासी बयानबाजी कर समाज को भ्रमित कर रहे हैं। जब नेतृत्व ही दिशाहीन हो, तो समाज को खुद अपनी राह चुननी पड़ती है। अब समय आ गया है कि योग्यता का सम्मान करने वाला वर्ग एकजुट होकर अपनी बौद्धिक शक्ति का परिचय दे।
निष्कर्ष: प्रतिभा को दबाना असंभव है :इतिहास गवाह है कि ज्ञान और परिश्रम के बल पर खड़ा समाज कभी पराजित नहीं हुआ। आरक्षण की आंधियां और भेदभाव की नीतियां कुछ समय के लिए बाधा तो बन सकती हैं, लेकिन वे उस सूरज को नहीं ढक सकतीं जो अपनी तपिश और मेहनत से चमकता है। यह रिजल्ट इस बात का प्रमाण है कि 'सवर्ण समाज' कल भी अपनी मेधा के शिखर पर था और आज भी है।
मेधा का सम्मान होना चाहिए, परिश्रम का मूल्यांकन होना चाहिए और शिक्षा को राष्ट्रनिर्माण का सर्वोच्च साधन मानकर आगे बढ़ना चाहिए।
किसी भी राष्ट्र की प्रगति उसकी सड़कों, भवनों या आंकड़ों से नहीं, बल्कि उसकी प्रतिभा, ज्ञान और नवाचार क्षमता से मापी जाती है। इतिहास गवाह है कि जिन देशों ने योग्यता, अनुसंधान और शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी, वही विश्व मंच पर अग्रणी बने।

देश का विकास तभी संभव है जब प्रतिभा को उसका उचित सम्मान और अवसर मिले। यदि परिश्रम, क्षमता और उत्कृष्टता को पर्याप्त मंच न मिले और निर्णय अल्पकालिक या संकीर्ण दृष्टिकोण से प्रभावित हों, तो इसका सीधा प्रभाव राष्ट्र की दीर्घकालिक प्रगति पर पड़ता है।

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