logo

अभी का जीवन – नास्तिक का विश्वास

अध्याय: अभी का जीवन – नास्तिक का विश्वास

मैं जी रहा हूँ—
अज्ञानी हूँ,
कल क्या होगा, कोई पता नहीं।
जीवन को अभी देख रहा हूँ,
बोध कर रहा हूँ—
यही सत्य है, यही ईश्वर है,
यही समय है।

यह जीना ही मेरा विश्वास है,
यही श्रद्धा है।
इन पलों में न कोई धन है,
न कोई व्यवस्था,
न कोई धर्म,
न कोई गुरु।
यह पल ही सब कुछ है।

कल क्या होगा—
मुझे नहीं मालूम।
मैं बस देखता हूँ,
सीखता हूँ,
हर अनुभव में आनंद खोजता हूँ।
विज्ञान भी सीख रहा हूँ,
सिख भी रहा हूँ,
और सीखने में ही आनंद है।
यह सीखना कल के लिए नहीं,
भविष्य के लिए नहीं—
बस सीखना ही मेरा आनंद है।

यह लिखना भी मेरा आनंद है—
इसलिए नहीं लिखता कि कुछ मिलेगा,
बल्कि जो भीतर ऊर्जा है,
उसे जी रहा हूँ,
उसे बहने दे रहा हूँ।
यह कर्म, यह गति—
यह सब जीवन का खेल है।

मुझे सीख पर विश्वास नहीं,
लेकिन भीतर जो है,
वही सब कुछ है।
मेरे भीतर ही सब संभावना मौजूद है।
भविष्य की कोई मजबूरी नहीं,
कोई संघर्ष नहीं—
यह लिखना, यह जीना,
सब नृत्य है,
गीत है,
संगीत है,
और उसका आनंद है।

मैं कुछ करता नहीं—
बस देख रहा हूँ।
हाथ, पैर, आँख, बुद्धि—
सब चल रहे हैं,
सिर्फ एक संकेत है—
चलो, या रुको।
बाकी सब हो रहा है।

मुझे पूरा विश्वास है—
कल दुःख भी आएगा,
तो वह भी वरदान होगा।
क्योंकि दुःख भी बदलता है,
सुख बन जाता है।
इसलिए किसी दुःख के लिए
कोई उपाय नहीं खोजता।
जन्म नहीं देखा,
तो मृत्यु भी देख लेंगे।
मृत्यु भी इसी पल में घटेगी—
जब आएगी, देख लेंगे।
उसे टालना असंभव है—
वह निश्चित है।

अगर दुःख आए,
तो जी लेंगे,
वह बदल जाएगा।
विश्वास और अस्तित्व का नियम
मुझे भीतर से जीना सिखा गया है।

मैंने जीवन को छोड़कर
कुछ पाया नहीं—
यही जीवन सबसे बड़ा ईश्वर है।
कर्म, गति, आनंद—
सब कुछ जीवन में पर्याप्त है।

अगर दुःख आए,
तो आने दो,
सुख आए,
तो आने दो।
दोनों का आना ही चाहिए—
जैसे चलते हैं,
एक पैर आगे,
एक पीछे।

अगर सुख को चुनकर
आगे रखते हो,
तो पीछे दुःख निश्चित है—
उसे टालना असंभव है।
यह अस्तित्व का नियम है—
दोनों शुभ हैं,
अशुभ कुछ नहीं।

यह मेरा नास्तिक जीवन है—
और तुम्हारा योजना वाला
आस्तिक जीवन।
आस्तिक मतलब—
आशा, गुरु, धर्म, भगवान,
धन, साधन, योजना, शिक्षा—
कई प्रकार के विश्वास
खड़े करके बैठे हो,
फिर भी दो पल जीना संभव नहीं।

भगवान, ईश्वर, गुरु,
धर्म, भीड़, वीर—
सब स्मरण में लगे हैं,
फिर भी दुखी हो।
क्यों?
क्योंकि तुम आस्तिक हो—
और मैं बस जी रहा हूँ।

---
𝕍𝕖𝕕𝕒𝕟𝕥 𝟚.𝟘 𝕃𝕚𝕗𝕖 — 𝕃𝕚𝕗𝕖 𝕚𝕤 𝔻𝕚𝕧𝕚𝕟𝕖, 𝕒𝕟𝕕 𝕥𝕙𝕖 𝔻𝕚𝕧𝕚𝕟𝕖 𝕚𝕤 𝕃𝕚𝕗𝕖.


7
832 views