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गले में नरमुंडों की माला, माथे से निकलती ज्वाला, काशी की शिव बारात में दिखा कलाकारों का अद्भुत स्वरूप, लोग हुए रोमांचित



वाराणसी। महाशिवरात्रि पर काशी एक बार फिर अद्भुत आस्था और लोक-रंग के विराट दृश्य की साक्षी बनी। महामृत्युंजय मंदिर से मैदागिन (डेढ़सी पुल) तक निकली भव्य शिव बारात ने पूरे शहर को शिवमय कर दिया। ‘जस दुलहा तस बनी बराता’ की कहावत मानो सजीव हो उठी-दूल्हा भी अलौकिक, बराती भी अद्भुत!
रोमांचक स्वरूपों ने थाम ली सांसें
गले में नरमुंडों की माला, शरीर पर भस्म, और कुछ कलाकारों के माथे से निकलती ज्वाला-सी अग्नि—इन सजीव प्रतीकों ने दर्शकों में सिहरन और रोमांच भर दिया। शिवगणों का स्वरूप धारण किए शिव बारात के कलाकारों के शिव वेश, औघड़, भूत-पिशाच, दैत्य-राक्षस, बंदर-भालू, सपेरे और मदारी सब एक ही जुलूस में, एक ही भाव में। इस अद्भुत शिव बारात को देखने के लिए सड़कों के दोनों ओर और छतों पर जनसैलाब उमड़ा रहा। जैसे ही बारात आगे बढ़ती, “हर-हर महादेव” के जयघोष से आसमान गूंज उठता।



44 वर्षों की परंपरा, बढ़ती भव्यता
करीब 44 वर्षों से निरंतर निखरती यह शिव बारात आज काशी का सबसे बड़ा लोक उत्सव बन चुकी है। मान्यता है कि काशी विश्वनाथ मंदिर के अर्घ्य से सोने की चोरी और उसकी पुनर्प्राप्ति के बाद इस उत्सव की शुरुआत हुई थी। तब से यह आयोजन लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन गया है।




सौहार्द और संस्कृति का संगम
इस वर्ष दूल्हे के रूप में प्रसिद्ध नेत्र चिकित्सक डॉ. अनुराग टंडन नजर आए, जबकि डॉक्टर रमेश दत्त पांडेय शाहबाला बने। व्यापारिक नेता बदरुद्दीन अहमद खान की सहभागिता ने काशी की गंगा-जमुनी तहजीब की सुंदर झलक पेश की। विशेष आकर्षण के रूप में अभिनेता संजय मिश्रा की मौजूदगी ने रौनक बढ़ा दी, वहीं बरसाने की लठमार होली की झांकी ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

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