
जनगणना 2026: अब पूछा जाएगा—क्या खाते हैं, स्मार्टफोन चलाते हैं या नहीं? आंकड़ों के बहाने जीवनशैली की पड़ताल पर सवाल भी
अप्रैल से शुरू होने जा रही राष्ट्रीय जनगणना इस बार कई मायनों में पहले से अधिक विस्तृत और अलग होने जा रही है। आबादी की पारंपरिक गणना के साथ-साथ अब नागरिकों के जीवन स्तर, डिजिटल पहुंच और खाद्य आदतों से जुड़ी जानकारी भी एकत्र की जाएगी। यानी जब गणनाकर्मी आपके दरवाजे पर पहुंचेंगे, तो वे केवल परिवार के सदस्यों की संख्या नहीं पूछेंगे, बल्कि यह भी जानना चाहेंगे कि घर में स्मार्टफोन है या नहीं, इंटरनेट कनेक्शन है या नहीं, और परिवार मुख्य रूप से किस प्रकार का अनाज उपभोग करता है।
बदलते सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य का हवाला :
सरकार और जनगणना निदेशालय के अधिकारियों का कहना है कि यह कदम बदलते सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य को ध्यान में रखकर उठाया गया है। डिजिटल इंडिया के दौर में यह जानना आवश्यक माना जा रहा है कि कितने परिवार इंटरनेट से जुड़े हैं और कितनों के पास स्मार्टफोन उपलब्ध है। साथ ही खाद्य आदतों की जानकारी से खाद्य सुरक्षा और पोषण से जुड़ी नीतियों को अधिक प्रभावी बनाने का दावा किया जा रहा है।
अधिकारियों के अनुसार, इन आंकड़ों के आधार पर भविष्य की कल्याणकारी योजनाओं, डिजिटल सेवाओं के विस्तार और सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार के लिए ठोस नीति-निर्माण संभव होगा।
उत्तराखंड में तैयारियां तेज :
उत्तराखंड में इस महाअभियान को लेकर तैयारियां तेज कर दी गई हैं। मुख्य सचिव की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में 25 अप्रैल से 24 मई तक भवन गणना (हाउस लिस्टिंग) कराने पर सहमति बनी है। इस अवधि के दौरान प्रत्येक भवन का विवरण—उसका उपयोग, निर्माण की स्थिति और उसमें निवास करने वाले परिवारों की जानकारी—दर्ज की जाएगी। यही चरण आगे होने वाली जनसंख्या गणना की आधारशिला माना जा रहा है। जल्द ही औपचारिक अधिसूचना जारी होने की बात कही गई है।
स्वगणना का विकल्प भी :
9 अप्रैल से 24 अप्रैल के बीच नागरिकों को स्वगणना का विकल्प भी दिया जाएगा। निर्धारित पोर्टल पर लोग स्वयं अपने परिवार और भवन से संबंधित जानकारी भर सकेंगे। अधिकारियों का कहना है कि इससे प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और तेज होगी। हालांकि, जो लोग स्वगणना नहीं करेंगे, उनके यहां तय अवधि में गणनाकर्मी पहुंचकर जानकारी एकत्र करेंगे।
पहली बार शामिल हुए ये सवाल :
निदेशक जनगणना ईवा आशीष श्रीवास्तव के अनुसार, इस बार अनाज की खपत, इंटरनेट कनेक्टिविटी और स्मार्टफोन उपयोग से जुड़े प्रश्न पहली बार शामिल किए गए हैं। उनका कहना है कि इन सवालों का उद्देश्य केवल आंकड़े जुटाना नहीं, बल्कि समाज के बदलते स्वरूप को समझना है।
आलोचनात्मक दृष्टि: आंकड़ों का दायरा या निजता पर सवाल?
हालांकि, इन नए सवालों को लेकर कुछ विशेषज्ञ और नागरिक चिंता भी जता रहे हैं। उनका कहना है कि जनगणना का मूल उद्देश्य आबादी का आकलन और बुनियादी सामाजिक-आर्थिक डेटा जुटाना होता है, लेकिन अब व्यक्तिगत जीवनशैली और डिजिटल उपयोग जैसे पहलुओं की पड़ताल से निजता के अधिकार पर बहस तेज हो सकती है।
सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या स्मार्टफोन और इंटरनेट उपयोग जैसे डेटा का संग्रह केवल कल्याणकारी योजनाओं तक सीमित रहेगा, या भविष्य में इसका अन्य प्रशासनिक या निगरानी उद्देश्यों के लिए भी इस्तेमाल हो सकता है?
सरकार का पक्ष है कि सभी जानकारियां सांख्यिकीय और गोपनीय उद्देश्यों के लिए ही उपयोग होंगी। लेकिन पारदर्शिता, डेटा सुरक्षा और नागरिकों के भरोसे को लेकर स्पष्ट और ठोस आश्वासन देना भी उतना ही जरूरी माना जा रहा है।
जनगणना एक राष्ट्रीय अभ्यास है, जो देश की दिशा तय करने वाले आंकड़े प्रदान करता है। ऐसे में यह जरूरी है कि आंकड़ों का दायरा बढ़े तो उसके साथ जवाबदेही और डेटा सुरक्षा के मानक भी उतने ही मजबूत हों।