*वर्तमान परिवेश में बुजुर्गों की महत्ता*
जयशंकर सिंह भदौरिया
स्वतंत्र पत्रकार, बांका (बिहार)
बांका,15 फरवरी 2026: भारतीय संस्कृति में बुजुर्गों को परिवार और समाज का आधार माना जाता है।वे अनुभवों का खजाना हैं जो नई पीढ़ी को जीवन के सूत्र सिखाते हैं। आज के तेज रफ्तार दौर में भी उनकी प्रासंगिकता अटल है क्योंकि वे धैर्य, संतोष और नैतिक मूल्यों के प्रतीक हैं।
अनुभवों के अमूल्य भंडार हमारे बुजुर्ग जीवन की कठिनाईयों से जूझकर आए हैं। उनकी कहानियां हमें संघर्ष से लड़ना सिखाती हैं। आधुनिक युवा भौतिक सुखों की दौड़ में ब्यस्त हैं, लेकिन बुजुर्ग सरल जीवनशैली से सिखाते हैं कि सच्ची खुशी रिश्तों में है।वे परंपराओं के संरक्षक हैं जो संस्कृति को जीवंत रखते हैं।
आज एकल परिवार और शहरीकरण से बुजुर्ग अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं जिससे वे बोझ समझे जाने लगे हैं। फिर भी उनका मार्गदर्शन नीतियों और निर्णयों में आज भी उपयोगी है। अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस जैसे प्रयास जागरुकता बढ़ा रहे हैं।
हमें उनके साथ समय बिताना चाहिए।उनका हाथ थामना, बातें सुनना हमें मजबूत बनाता है। यदि आज हम उनकी उपेक्षा करेंगे तो कल हमारे बच्चे भी हमारे साथ वैसा ही व्यवहार करेंगे। सामाजिक जागरूकता से वृद्धाश्रमों की आवश्यकता कम हो सकती है। बुजुर्ग हमारी धरोहर हैं।उनका सम्मान ही समाज का भविष्य सुरक्षित करेगा।