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जीवन में प्रेम खिलता है स्वाभाविक जीवन जीने धर्म धार्मिक नाटक से प्रेम असंभव है, जिसके पास तब कोई कृत्रिम मुखौटा नहीं चाहिए,

तुम्हारी सत्ता से प्रेम पैदा नहीं होता।
भगवान बनने की इच्छा से प्रेम नहीं खिलता।
प्रेम कोई ज्ञान नहीं, कोई उपदेश नहीं —
वह स्वाभाविक ऊर्जा है, जो बिना कारण बहती है।
जैसे वृक्ष बिना घोषणा के ऑक्सीजन देता है,
जैसे फूल बिना धर्म के खिलते हैं —
वैसे ही प्रेम होता है।
जहाँ अभिनय है, वहाँ भक्ति नहीं।
जहाँ दिखावा है, वहाँ जीवन नहीं।
मूर्खता यह है कि प्रेम को नाटक बना दिया गया —
गुरु बनने का नाटक, भक्त बनने का नाटक, भगवान बनने का नाटक।
नाटक छोड़ो।
स्वाभाविक जीवन जियो।
हर जीव के भीतर प्रेम का बीज पहले से है।
जीवन ही भगवान है।
तुम स्वयं प्रेम हो — बस जीओ। ✍🏻 — 🙏🌸 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓣

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