चार लेबर कोड लागू: श्रमिक सुधार या असुरक्षा की नई बहस?
देश में श्रम व्यवस्था को लेकर एक बार फिर व्यापक बहस छिड़ गई है। 21 नवंबर 2025 को केंद्र सरकार द्वारा चार नए लेबर कोड लागू किए जाने के बाद मजदूर संगठनों, ट्रेड यूनियनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच चिंता और विरोध की आवाज़ें तेज़ हो गई हैं। सरकार जहाँ इन कानूनों को “श्रम सुधारों का ऐतिहासिक कदम” बता रही है, वहीं आलोचक इन्हें श्रमिक अधिकारों को कमजोर करने वाला और रोजगार सुरक्षा पर असर डालने वाला निर्णय मान रहे हैं ।सरकार ने देश के 29 पुराने श्रम कानूनों को समेटकर चार व्यापक कोड लागू किए हैं:
1️⃣ वेतन संहिता (Code on Wages) 2️⃣ औद्योगिक संबंध संहिता (Industrial Relations Code)
3️⃣ व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य परिस्थितियाँ संहिता (OSH Code)
4️⃣ सामाजिक सुरक्षा संहिता (Social Security Code)
सरकार का दावा है कि इससे श्रम कानूनों को सरल बनाया जाएगा, उद्योगों में निवेश बढ़ेगा और रोजगार के नए अवसर बनेंगे।ट्रेड यूनियनों और श्रमिक संगठनों का आरोप है कि इन कोड्स को लागू करने से पहले व्यापक परामर्श नहीं किया गया। उनका कहना है कि इतने बड़े बदलाव से करोड़ों श्रमिक प्रभावित होंगे, इसलिए संसद से बाहर सामाजिक संवाद आवश्यक था।कानूनों के सरलीकरण के नाम पर श्रमिक सुरक्षा कमजोर की जा रही है।संगठित और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के बीच असमानता बढ़ सकती है।रोजगार की स्थिरता कम होकर ठेका और अस्थायी काम बढ़ने की आशंका है।वेतन संहिता को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा न्यूनतम मजदूरी की व्यवस्था पर हो रही है।श्रम संगठनों का कहना है कि पहले न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948 मजदूरी सुरक्षा का स्पष्ट ढांचा देता था, जबकि नए ढांचे में राज्यों और नियोक्ताओं की भूमिका बढ़ जाने से मजदूरी निर्धारण में असमानता की आशंका है।सरकार का मानना है कि मजदूरी निर्धारण अधिक लचीला होगा,श्रमिकों की सौदेबाज़ी क्षमता घट सकती है,असंगठित क्षेत्र पर नकारात्मक असर पड़ेगा।लेकिन औद्योगिक संबंध संहिता को लेकर यह आशंका जताई जा रही है कि:हड़ताल के नियम अधिक कठोर हो सकते हैं।यूनियन बनाने और सामूहिक कार्रवाई की प्रक्रिया जटिल हो सकती है।बड़े प्रतिष्ठानों को छंटनी और पुनर्गठन में अधिक स्वतंत्रता मिल सकती है।श्रमिक संगठनों का कहना है कि इससे “नौकरी की स्थिरता” प्रभावित हो सकती है।व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य संहिता (OSH Code) पर सामाजिक समूहों ने कार्यस्थल सुरक्षा के प्रभावी क्रियान्वयन पर सवाल उठाए हैं।विशेषकर महिला श्रमिकों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा तेज़ है:रात्रि पाली में महिलाओं के काम को अनुमति — समर्थक इसे समान अवसर बताते हैं।आलोचक इसे पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था के बिना जोखिमपूर्ण मानते हैं।स्वास्थ्य, कार्यघंटे और निगरानी तंत्र को लेकर स्पष्ट दिशानिर्देशों की मांग की जा रही है।सरकार का दावा है कि यह कोड गिग व प्लेटफॉर्म वर्कर्स सहित अधिक लोगों को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाएगा।लेकिन श्रमिक संगठनों का कहना है कि:सामाजिक सुरक्षा लागू करने की जिम्मेदारी और फंडिंग संरचना स्पष्ट नहीं है।दंडात्मक प्रावधानों के स्थान पर जुर्माने की व्यवस्था से नियोक्ताओं की जवाबदेही कम हो सकती है।असंगठित क्षेत्र के करोड़ों श्रमिकों को वास्तविक लाभ मिलने में समय लगेगा।यह मुद्दा अब केवल श्रम नीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया है।विपक्षी दल सरकार पर “कॉरपोरेट समर्थक नीति” का आरोप लगा रहे हैं, जबकि सरकार इसे “Ease of Doing Business और श्रमिक कल्याण का संतुलित मॉडल” बता रही है।
लेकिन असली असर इन कानूनों के लागू होने के तरीके पर निर्भर करेगा।यदि—न्यूनतम मजदूरी का वैज्ञानिक निर्धारण ,सामाजिक सुरक्षा का वास्तविक विस्तार, श्रमिक-नियोक्ता संतुलन प्रभावी निरीक्षण प्रणाली सुनिश्चित की जाती है, तो ये सुधारकारी साबित हो सकते हैं।अन्यथा असंतोष और श्रम विवाद बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।यह बदलाव देश को अधिक औद्योगिक प्रतिस्पर्धा की ओर ले जाएगा या श्रमिक असुरक्षा की ओर — इसका उत्तर आने वाले वर्षों में इनके क्रियान्वयन, निगरानी और सामाजिक संवाद पर निर्भर करेगा।
बोकरो से नरेंद्र की रिपोर्ट