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वेलेंटाइन डे: प्यार के नाम पर मुनाफ़े का खेल? — एक सामाजिक चेतावनी

विशेष रिपोर्ट | 14 फरवरी
बाप अपनी पूरी ज़िंदगी की मेहनत, ईमानदारी और संघर्ष से परिवार की इज़्ज़त बनाता है, लेकिन आज के दौर में बाज़ारवाद और दिखावटी प्रेम-संस्कृति के दबाव में वही इज़्ज़त कई बार अनजाने में दांव पर लग जाती है।
14 फरवरी को मनाया जाने वाला वेलेंटाइन डे, जिसे प्रेम का प्रतीक बताया जाता है, आज एक विशाल व्यावसायिक आयोजन में तब्दील हो चुका है।
यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि—
क्या वेलेंटाइन सच में त्योहार है या फिर अरबों रुपये का सुनियोजित व्यापार?
कौन करता है वेलेंटाइन को प्रमोट?
हर साल दिसंबर से फरवरी के बीच एक तयशुदा माहौल तैयार किया जाता है।
इसमें सक्रिय भूमिका निभाते हैं—
फिल्म और मनोरंजन जगत जैसे बॉलीवुड
टीवी सीरियल और निजी न्यूज़ चैनल
एफएम रेडियो
सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग
इन सभी के ज़रिये प्रेम, आकर्षण और आज़ादी के नाम पर एक खास मानसिकता गढ़ी जाती है।
कमाई किसकी होती है?
शुरुआती मुनाफ़ा
विदेशी गिफ्ट और चॉकलेट कंपनियों का
बेकरी और फ़्लावर इंडस्ट्री का
गर्भनिरोधक उत्पाद बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों का
मनोरंजन और अश्लील कंटेंट इंडस्ट्री का
बाद का कड़वा सच
गर्भपात और गुप्त रोगों के इलाज से जुड़े अवैध और अनैतिक नेटवर्क
सोशल मीडिया और पोर्न साइट्स की ट्रैफिकिंग
कथित “सच्ची घटनाओं” पर आधारित सीरियल और शॉर्ट फिल्मों का व्यापार
महिला सुरक्षा के नाम पर राजनीतिक लाभ लेने वाले अवसरवादी नेता
यह एक ऐसा चक्र है, जिसमें संवेदनाएँ नहीं, केवल पैसा चलता है।
सबसे ज़्यादा प्रभावित कौन?
इस पूरे तंत्र में सबसे ज़्यादा शिकार होती हैं—
छोटे शहरों और कस्बों की मध्यमवर्गीय एवं निम्न आय वर्ग की युवा लड़कियाँ
वे परिवार, जिनकी कोई राजनीतिक या कानूनी पहुँच नहीं होती
भोले-भाले माता-पिता, जिन्हें लगता है कि “यह हमारी बेटी के साथ नहीं होगा”
हकीकत यह है कि कोई गारंटी नहीं होती।
क्यों खतरनाक होता है फरवरी?
समाजशास्त्रियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि फरवरी महीना योजनाबद्ध प्रचार, भावनात्मक दबाव और भ्रम का चरम होता है।
कुछ भी अचानक नहीं होता—
इसके पीछे कारण है 👉 पैसा और बाज़ार।
निष्कर्ष: ज़रूरत जागरूकता की, न कि प्रलाप की
वेलेंटाइन डे को लेकर सवाल उठाना न तो प्रेम का विरोध है, न ही आधुनिकता से दुश्मनी।
यह अपनी बेटियों, परिवार और समाज को सचेत करने की अपील है।
👉 ज़रूरत है खुली चर्चा की
👉 ज़रूरत है उपाय खोजने की
👉 ज़रूरत है बच्चों से संवाद की
आँख मूंदकर बहाव में बहने की नहीं।

✍️ पत्रकार : आनंद किशोर
ब्यूरो चीफ : अखंड भारत न्यूज़
सदस्य : ऑल इंडिया मीडिया एसोसिएशन (AIMA)

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