काश इस तरह की तरक्की की फसल काटने का मौका हमें भी मिल जाता।
अंबाला: तरक्की की फसल हम भी काट लेते।
थोड़े से तलवे अगर हम भी चाट लेते।
मेरे लहजे में जी हजूर ना था।
इसके इलावा मेरा कोई कसूर ना था।
पल भर के लिए अगर मैं बेजमीर हो जाता।
यकीन मानिए मैं कब का अमीर हो जाता।
आजाद सोच जिंदाबाद।
सुरजीत सरपंच 🙏