अच्छा इंसान बनना इतना मुश्किल क्यों?
ख़ालिद सैफ़ुल्लाह मोतिहारी
बाहरी तौर पर यह सवाल बहुत साधारण लगता है, लेकिन इसकी तह में हमारे पूरे सामाजिक और भीतरी जीवन की एक गहरी कहानी छिपी है। हर व्यक्ति “अच्छा” कहलाना तो चाहता है, पर अच्छा बनने की कीमत चुकाने से कतराता है। हम सब प्रशंसा के इच्छुक हैं, मगर आत्म-सुधार की कठिन राह से डरते हैं। यही विरोधाभास इस मूल प्रश्न को जन्म देता है कि आखिर अच्छा इंसान बनना इतना कठिन क्यों महसूस होता है?
अच्छा इंसान बनने की प्रक्रिया बाहर से नहीं, भीतर की शुद्धि से शुरू होती है। और अपनी अंतरात्मा को सँवारना दुनिया के सबसे कठिन कामों में से एक है। कपड़े बदल लेना, मीठा बोल लेना या कुछ आकर्षक वाक्य याद कर लेना तो महज़ एक अभिनय है, जो कोई भी कर सकता है। असली परीक्षा वहाँ से शुरू होती है जहाँ नीयत को खोट से साफ़ करना हो, ईर्ष्या की आग को ठंडा करना हो, और बदला लेने की शक्ति होते हुए भी क्षमा का रास्ता चुनना हो। यही वह मैदान है जहाँ इंसान को अपने ही विरुद्ध संघर्ष करना पड़ता है।
हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ नैतिक मूल्यों की परिभाषाएँ बदल दी गई हैं। चालाकी को “बुद्धिमत्ता” और कठोरता को “मजबूती” का नाम दे दिया गया है। यदि आपका दिल नरम है तो आपको कमज़ोर समझा जाता है; यदि आप सच बोलते हैं तो आपको सीधा-सादा या मूर्ख कहा जाता है; और यदि आप सिद्धांतों पर अडिग रहें तो कहा जाता है कि आपको ज़माने की समझ नहीं है। जब समाज ही मूल्यों को उलट कर नापने लगे, तो सीधे रास्ते पर चलने वाला व्यक्ति अपने आप अजनबी लगने लगता है।
अच्छा बनने का अर्थ अक्सर अपनी इच्छाओं का त्याग करना होता है। मन हमेशा त्वरित सुख और तात्कालिक लाभ चाहता है, जबकि अच्छाई का फल अक्सर धैर्य की कोख से जन्म लेता है। झूठ बोलकर थोड़ी देर की सफलता पा लेना आसान है, मगर सच का भार उठाना एक निरंतर तपस्या है। जैसा कि एक शायर ने कहा है
“उसूलों पर जहाँ आँच आए, टकराना ज़रूरी है,
जो ज़िंदा हो, तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है।”
बदला लेने से दिल को थोड़ी देर का सुकून मिल सकता है, लेकिन क्षमा करने के लिए दिल को आकाश जितना विशाल बनाना पड़ता है। मन को आराम पसंद है, पर चरित्र को सत्य की गर्मी में तपना पड़ता है।
आज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम अच्छा बनने से अधिक “अच्छा दिखने” की दौड़ में शामिल हैं। यदि नेकी दिखावे और प्रसिद्धि की मोहताज हो जाए तो उसका असली वजन कम हो जाता है। सच्ची इंसानियत तो वह है जो उस एकांत में भी कायम रहे जहाँ न कोई देखने वाला हो, न ताली बजाने वाला, और न कोई पुरस्कार देने वाला। भीड़ में नेक बनना सामाजिक आवश्यकता हो सकती है, मगर अकेले में नेक रहना वास्तविक मानवीय गुण है।
सच तो यह है कि अच्छा इंसान बनना शायद उतना कठिन नहीं, जितना निरंतर अच्छा बने रहना है। एक दिन किसी पर दया कर देना भावनाओं की लहर हो सकती है, मगर जीवन भर व्यवहार में संतुलन और विनम्रता बनाए रखना सतत अभ्यास माँगता है। चरित्र किसी एक घटना का नाम नहीं; यह वर्षों की निरंतर साधना और अंतरात्मा की लगातार सींचाई का परिणाम है।
इन सब कठिनाइयों के बावजूद अच्छाई की राह कभी व्यर्थ नहीं जाती। इसका पहला और तात्कालिक पुरस्कार मन के भीतर एक गहरा सुकून और आत्म-संतोष के रूप में मिलता है। अंतरात्मा की तसल्ली वह संपत्ति है जो किसी चालाकी या छल से हासिल नहीं की जा सकती।
शायद असली प्रश्न यह नहीं कि अच्छा बनना मुश्किल क्यों है, बल्कि यह है कि क्या हम इस “मुश्किल” को अपनाने के लिए तैयार हैं? जिस दिन हम अच्छा कहलाने की चाह से मुक्त होकर अच्छा बनने की सच्ची आकांक्षा जगा लेंगे, उस दिन यह राह स्वयं आसान होती चली जाएगी।