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प्रस्तावना — प्रथम विज्ञान

प्रस्तावना — प्रथम विज्ञान
यह लेख किसी धर्म, मत, परंपरा या विचारधारा का विस्तार नहीं है।
यह जीवन को उसके मूल रूप में देखने का प्रयास है — जहाँ सृष्टि, शरीर, ऊर्जा और बोध एक ही निरंतर प्रवाह के रूप में समझे जाते हैं।
इस प्रथम विज्ञान में ब्रह्मांड की शुरुआत शून्य (0) से मानी जाती है — वह शून्य जो खाली नहीं, बल्कि सम्पूर्ण संभावनाओं का आधार है। उसी से तेज उत्पन्न होता है, तेज से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से पानी, और पानी से जड़ रूप। जड़ से जीवन प्रकट होता है और अनेक रूपांतरणों से गुजरते हुए मानव का जन्म होता है।
मानव केवल अंतिम रूप नहीं, बल्कि एक द्वार है — जहाँ ऊर्जा स्वयं को पहचान सकती है। शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि विकास की अवस्थाएँ हैं; लेकिन इनके पार होश या बोध की संभावना छिपी है। यही बोध ऊर्जा की अपनी ओर लौटने की यात्रा है।
जीवन का स्वभाव गति है, परिवर्तन है। जहाँ यह गति रुकती है, वहाँ विकृति जन्म लेती है। धर्म जब भावना में अटक जाता है और विज्ञान जब केवल बुद्धि व साधन तक सीमित रह जाता है, तब दोनों अंतिम रूपांतरण को रोक देते हैं। यही रुकावट संसार की माया बन जाती है।
यह ग्रंथ किसी को नया मार्ग देने के लिए नहीं, बल्कि यह दिखाने के लिए है कि जीवन स्वयं एक यात्रा है — शून्य से रूप तक और रूप से पुनः शून्य तक।
यहीं से प्रथम विज्ञान की यात्रा प्रारम्भ होती है।
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प्रथम विज्ञान — ऊर्जा और बोध के सूत्र

✧ सृष्टि सूत्र

0 (शून्य) ही मूल है — वही ब्रह्मांड का बीज है।
0 से तेज उत्पन्न होता है।
तेज से आकाश प्रकट होता है।
आकाश से वायु जन्म लेती है।
वायु से अग्नि उत्पन्न होती है।
अग्नि से पानी बनता है।
पानी से जड़ रूप बनता है।

✧ जीवन सूत्र

जड़ से जीव उत्पन्न होता है।
जीव अनेक रूपों में विकसित होता है — 84 लाख योनियाँ ऊर्जा का विस्तार हैं।
विकास का शिखर मानव है।
मानव में शरीर, इन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ विकसित होती हैं।
मन अनुभव का केंद्र है।
बुद्धि निर्णय का उपकरण है।

✧ बोध सूत्र

मन और बुद्धि के विकास से होश उत्पन्न होता है।
होश = तेज = आत्मा = दृष्टि।
बोध ऊर्जा की स्वयं को पहचान है।

✧ उलटी यात्रा सूत्र

विकास की अंतिम दिशा सूक्ष्म की ओर लौटना है।
जड़ से पुनः आकाश और फिर 0 की ओर यात्रा होती है।
मिटना समाप्त होना नहीं — मूल में लौटना है।

✧ धर्म और विज्ञान सूत्र

धर्म भावना में रुक जाए तो रूपांतरण रोकता है।
विज्ञान बुद्धि में रुक जाए तो अहंकार बढ़ाता है।
दोनों यदि अंतिम बोध तक न जाएँ — विकृति बन जाते हैं।
✧ माया सूत्र

भगवान की कल्पना, पहचान, प्रसिद्धि — मन का खेल है।
रूप या भाव में अटकना विकास रोक देता है।
इच्छा और स्वप्न में जीना = माया।

✧ जीवन सूत्र

जीवन का स्वभाव गति और रूपांतरण है।
रुकना ही दुख का मूल है।
काम और क्रोध बुरे नहीं — ठहराव बुरा है।

✧ अंतिम सूत्र

शून्य से जन्म, रूप में यात्रा, शून्य में वापसी — यही पूर्ण विज्ञान है।

Vedanta 2.0: The Contemporary Path of Life, Philosophy, and Spiritual Insight


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