गृहस्थी योग
गृहस्थी योग
पुरुष बाहर जाता है,
संघर्ष करता है,
दुनिया से जूझता है,
जीतता है, हारता है,
नाम, काम, धन, मान लेकर लौटता है।
पर घर की देहरी पर
उसकी सारी जीत उतर जाती है।
वह भीतर आता है
और स्त्री के सामने हार जाता है।
यही उसकी पहली शांति है।
यह हार अपमान नहीं,
यह विश्राम है।
स्त्री बाहर की दुनिया में
शायद जीती नहीं,
शायद थक कर लौटी,
शायद उसे कोई मान न मिला —
पर घर के केंद्र में
वह जीत जाती है।
उसकी जीत अधिकार नहीं,
उसकी जीत अपनापन है।
दोनों अपने-अपने मैदान में
संघर्ष से भरे हैं।
एक बाहर से थका,
एक भीतर से टूटी —
पर जब दोनों आमने-सामने खड़े होते हैं
और अहंकार गिरता है,
तभी प्रेम उठता है।
कभी पुरुष झुकता है —
वह उसकी आध्यात्मिक जीत है।
कभी स्त्री पिघलती है —
वह उसकी गहरी मुक्ति है।
जब दोनों जीतने की ज़िद छोड़ दें,
दोनों हार को स्वीकार लें,
तभी गृहस्थी योग जन्म लेता है।
न कोई विजेता,
न कोई पराजित।
सिर्फ दो मनुष्य
जो प्रेम में हल्के हो गए।
यही जीवन का खेल है।
यही उसका रस है।
यही उसका ध्यान है।
वेदांत 2.0, Life