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भारतीय चेतना में जब जीवन कठिन हो जाता है।जब संघर्ष का दौर खत्म ही नहीं होता और तो और जब प्रार्थनाएं भी उत्तर हीन लगने लगती हैं।

तब मनुष्य सबसे पहले ईश्वर पर प्रश्न चिन्ह लगाता है। कहने लगता है ईश्वर साथ होते तो यह क्यों होता।यही वह क्षण है जहां सबसे बड़ी भूल जन्म लेती है, क्यों कि भारतीय आध्यात्मिक दृष्टि में संघर्ष ईश्वर की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि उसकी सबसे गहन उपस्थिति का संकेत होता है। ईश्वर तब मौन रहते हैं,जब मनुष्य को स्वयं से मिलने का समय आता है।यह मौन उपेक्षा नहीं, परीक्षा है।यह परखने का साधन है कि पीड़ा में मनुष्य टूटता है या भीतर से जागता है। इसलिए ईश्वर मौन रहते हैं, ताकि मनुष्य स्वयं को सुन सके। संघर्ष का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि उसे दंड समझ लिया जाता है। जबकि भारतीय वांग्मय और दर्शन संघर्ष को शाप नहीं बल्कि दिक्षा मानता है। उपनिषद कहते हैं तपसा ब्रम्ह विजिज्ञासस्व।तप के माध्यम से ही सत्य का बोध होता है।तप कोई अग्नि नहीं है, बल्कि वही संघर्ष है जो मनुष्य को भीतर से तपाता है,गलाता है और शुद्ध करता है। यदि ईश्वर केवल सुख में उपस्थित वाले होते तो वे सुविधा बनकर रह जाते। पर ईश्वर चेतना हैं और चेतना कभी भी बिना संघर्ष के विकसित नहीं होती। जिस जीवन में कोई टकराव नहीं कोई प्रश्न या समस्या नहीं, कोई पीड़ा नहीं,वह जीवन ऊपर से भले शांत दिखे पर चेतन नहीं होता। संघर्ष जीवन में वह दरार है, जिससे होकर प्रकाश भीतर प्रवेश करता है। महाभारत ग्रंथ में इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। अर्जुन का विषाद ईश्वर की अनुपस्थिति नहीं था, बल्कि वही क्षण था जहां कृष्ण विराट रूप में प्रकट हुए। गीता की जन्म आश्रम की नीरवता में नहीं, युद्ध भूमि की कोलाहल में हुआ।इसका अर्थ स्पष्ट है कि ईश्वर सबसे पहले वहीं प्रकट होते हैं, जहां मनुष्य टूटने की कगार पर खड़ा होता है।हम जब कहते हैं कि ईश्वर मेरी सुन क्यों नहीं रहे, तब हम यह मान बैठे होते हैं कि ईश्वर का काम केवल हमारी समस्याएं हल करना भर है। भारतीय अध्यात्म इसके भिन्न कहता है। ईश्वर समस्या हल नहीं करते, वो मनुष्य को सक्षम बनाते हैं। ताकि मनुष्य समस्या से बड़ा हो सके, संघर्ष समाधान नहीं रूपांतरण की प्रक्रिया है। संघर्ष में ईश्वर मौन रहते हैं, क्यों कि वह मौन परीक्षा है।यह देखा जाता है कि मनुष्य पीड़ा में अपने मूल से कितना जुड़ा रहता है। क्या वह सत्य छोड़ देता है क्या वह धैर्य खो देता है। क्या वह अपने कर्म से भागता है, संघर्ष में मनुष्य जैसा बनता है,वही उसका आंतरिक स्वरूप होता है,सुख तो केवल आवरण होता है।।।।क्रमशः

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