
नगर निगम के बैठक में पार्षद मनोज सोनकर का पानी के लिए बहस करना जनता की आंखों में धूल झोंकने के लिए बहाए जा रहे घड़ियाली आंसू हैं।
नगर निगम के बैठक में पार्षद मनोज सोनकर का पानी के लिए बहस करना जनता की आंखों में धूल झोंकने के लिए बहाए जा रहे घड़ियाली आंसू हैं।:- देशराज सनावर प्रदेश अध्यक्ष एससी विंग चंडीगढ़ आम आदमी पार्टी
पिछले 20 सालों से इस वार्ड की जनता ने भाजपा पर भरोसा जताया, लेकिन आज जब ट्यूबवेल की मोटरें दम तोड़ रही हैं और लोग बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं, तो पार्षद मनोज सोनकर जी सदन में 'जोर-शोर' से मुद्दा उठा रहे हैं। यह और कुछ नहीं, बल्कि जनता की आंखों में धूल झोंकने के लिए बहाए जा रहे घड़ियाली आंसू हैं।
सोनकर जी को यह समझना चाहिए कि दो दशकों का हिसाब एक दिन के हंगामे से साफ नहीं होता। सत्ता का आनंद तो खूब लिया, अब जब जवाबदेही की बारी आई तो शिकायतों का ढोंग रचा जा रहा है। उनके इस दिखावे पर बस यही पंक्तियां सटीक बैठती हैं:
"मलाल ये नहीं कि हाथों में पत्थर हैं आपके, > दुख ये है कि आइने के सामने भी आप ही हैं।"
रही बात उनकी इस बेचैनी की, तो उन्हें याद दिलाना जरूरी है कि जनता ने उन्हें सेवा के लिए चुना था, केवल पद की शोभा बढ़ाने के लिए नहीं। सत्ता आती-जाती रहती है, लेकिन वर्षों की विफलता को छिपाने के लिए आज का यह ड्रामा बेअसर है। जैसा कि मशहूर शायर राहत इंदौरी साहब कह गए हैं:
"जो आज साहिब-ए-मसनद हैं, कल नहीं होंगे, > किरायेदार हैं, ज़ाती मकान थोड़ी है; > सभी का खून शामिल है यहाँ की मिट्टी में, > किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है!"
और आज की इस स्थिति को देखते हुए पार्षद जी के लिए बस एक ही सलाह है:
"अरे भाई, कुर्सी है... जनाजा थोड़ी है! अगर काम नहीं हो रहा तो उसे छोड़ना सीखिए, मगर ये दिखावे के आंसू बहाकर जनता को अब और बेवकूफ मत बनाइए।"।