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खून चूसने का धंधा! आयुष्मान योजना में करोड़ों का खेल सिंगरौली के चार निजी अस्पताल जांच के घेरे में, प्रशासनिक चुप्पी से जनता आक्रोशित सिंगरौली।

खून चूसने का धंधा! आयुष्मान योजना में करोड़ों का खेल सिंगरौली के चार निजी अस्पताल जांच के घेरे में, प्रशासनिक चुप्पी से जनता आक्रोशित

सिंगरौली।
गरीबों के इलाज के लिए बनाई गई केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी आयुष्मान भारत योजना सिंगरौली में मुनाफाखोरी और भ्रष्टाचार का जरिया बनती दिख रही है। जिले के चार निजी अस्पतालों पर फर्जी बिलिंग, बिना इलाज भुगतान उठाने और मरीजों से अवैध वसूली के बेहद गंभीर आरोप सामने आए हैं। मामला करोड़ों नहीं, बल्कि अरबों की संभावित लूट की ओर इशारा कर रहा है।

आरोपों के घेरे में आए अस्पताल हैं

सिंगरौली हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर

मिश्रा पॉली क्लिनिक एंड नर्सिंग होम

वंदना हॉस्पिटल एंड ट्रॉमा सेंटर

विंध्य हॉस्पिटल, एनटीपीसी विन्ध्यनगर

मुफ्त इलाज की जगह निजी बिल, कार्ड अस्पताल के कब्जे में

आयुष्मान योजना के तहत दंत, हड्डी, स्त्री रोग, नेत्र, मेडिसिन, सर्जरी, इमरजेंसी और बाल रोग जैसी सेवाएं पूरी तरह निशुल्क हैं और उनका भुगतान सीधे सरकार करती है।
लेकिन मरीजों का आरोप है कि इन अस्पतालों में:

आयुष्मान कार्ड जबरन जमा करा लिए जाते हैं

मुफ्त इलाज नहीं दिया जाता

मरीजों को निजी बिल थमा दिए जाते हैं

किसी भी तरह की छूट नहीं दी जाती

इलाज हुआ ही नहीं, लेकिन लाखों का भुगतान उठा लिया

सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि कई मरीजों का इलाज किए बिना ही आयुष्मान पोर्टल पर हजारों से लेकर लाखों रुपये के बिल चढ़ा दिए गए।
कुछ मामलों में मरीज अस्पताल में भर्ती तक नहीं हुए, फिर भी इलाज दिखाकर भुगतान ले लिया गया। सूत्रों का दावा है कि यह फर्जीवाड़ा रोजाना के स्तर पर किया जा रहा है।

सरकारी डॉक्टर, सरकारी संसाधन और प्राइवेट कमाई

स्थानीय लोगों का कहना है कि ट्रॉमा सेंटर के डॉक्टर खुलेआम निजी प्रैक्टिस कर रहे हैं और सरकारी अस्पताल के संसाधनों का इस्तेमाल निजी अस्पतालों में मुनाफा कमाने के लिए हो रहा है।
सवाल यह भी उठता है कि—

> “शानदार कलेक्टर” के आगमन की चर्चा तो हुई,
लेकिन क्या कभी यह जांची गई कि सरकारी डॉक्टर ड्यूटी छोड़ निजी क्लीनिक कैसे चला रहे हैं?

मिश्रा पॉली क्लिनिक पर सबसे गंभीर आरोप

मिश्रा पॉली क्लिनिक को लेकर जनता का कहना है कि यह भ्रष्टाचार का केंद्र बिंदु बन चुका है। हैरानी की बात यह है कि:

न कोई पत्रकार खुलकर बोलता है

न ही अब तक किसी प्रशासनिक अधिकारी ने ठोस जांच शुरू की

इससे साफ है कि इन अस्पतालों का स्थानीय रसूख कितना गहरा है।

जांच का ‘रिवाज’ और पहले से लिखी स्क्रिप्ट

लोगों का आरोप है कि अगर जांच शुरू भी हुई तो वही पुरानी कहानी दोहराई जाएगी—
जांच, सुर्खियां और अंत में क्लीन चिट।
सिंगरौली में यह “रिवाज” पहले भी कई बार देखा जा चुका है।

अब सवाल सीधे शासन से

क्या आयुष्मान योजना की उच्चस्तरीय ऑडिट होगी?

क्या दोषी अस्पतालों पर एफआईआर और रिकवरी होगी?

या फिर गरीब मरीज इसी तरह लुटते रहेंगे?

कलेक्टर से उम्मीद नहीं, भरोसा

हालांकि जनता यह भी कह रही है कि अगर ईमानदार कार्रवाई संभव है तो वह सिंगरौली कलेक्टर गौरव साहब से ही संभव है। उम्मीद नहीं, बल्कि विश्वास है कि यदि उन्होंने संज्ञान लिया तो इस घोटाले में कठोर कार्रवाई होगी।

सवाल बड़े हैं, घोटाला भारी है और अब सिंगरौली जवाब मांग रही है।

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