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​शीर्षक: जनदर्शन की गरिमा पर भारी 'सुस्त अधिकारी': 7 महीनों की देरी न्याय नहीं, अन्याय है!

जांजगीर-चांपा:
जिला प्रशासन का 'जनदर्शन' कार्यक्रम जिले के नागरिकों के लिए अंतिम उम्मीद का केंद्र है। जहाँ थका-हारा आम आदमी अपनी जायज मांगों को लेकर कलेक्टर महोदय के समक्ष गुहार लगाता है। कलेक्टर महोदय की संवेदनशीलता पर कोई संदेह नहीं है—वे मौके पर ही अधिकारियों को 'प्राथमिकता' से निराकरण के आदेश देते हैं। लेकिन, विभागीय अधिकारियों की लापरवाही ने इस जन-हितैषी मंच को 'कागजी खानापूर्ति' में बदल दिया है।
​मुख्य मुद्दे जो कार्रवाई की मांग करते हैं:
​आदेशों की अवहेलना: जनदर्शन में दिए गए आवेदनों पर कई विभाग 6 से 7 महीनों तक कोई कार्रवाई नहीं करते। यह सीधे तौर पर कलेक्टर महोदय के आदेशों की नाफरमानी है।
​निकम्मापन और बेखौफी: निचले स्तर के अधिकारियों में कार्रवाई का डर खत्म हो चुका है, जिससे आम जनता को बार-बार कलेक्ट्रेट के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।
​न्याय में विलंब: जब महीनों तक फाइलें नहीं हिलतीं, तो आवेदकों का भरोसा शासन और प्रशासन से टूटने लगता है।
​कलेक्टर महोदय से अपील:
अब समय केवल 'आदेश' देने का नहीं, बल्कि 'ताबड़तोड़ कार्रवाई' करने का है। जब तक लापरवाह अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई (जैसे वेतन रोकना या शो-कॉज नोटिस) नहीं होगी, तब तक जनदर्शन का उद्देश्य पूरा नहीं होगा।
​"जनदर्शन केवल एक कार्यक्रम नहीं, जनता का विश्वास है। इस विश्वास को फाइल के नीचे दबने न दें।"

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