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कागजों में पानी, जमीन सूखी...फिजिबिलिटी में पानी बताया, वहां 8 ट्यूबवेल सूखे, हर तीसरी रिपोर्ट झूठी

झालावाड़| जिले में भूजल विभाग की फिजिबिलिटी रिपोर्ट अब एक तकनीकी दस्तावेज नहीं, बल्कि संदेहास्पद कागज बनकर रह गई है। विभाग ने जिन 20 स्थानों पर ट्यूबवेल निर्माण के लिए भूजल उपलब्ध होने की फिजिबिलिटी रिपोर्ट दी, उनमें से 8 ट्यूबवेल खुदाई के दौरान ही सूखे निकले। यानी, रिपोर्ट बनी, पैसा मंजूर हुआ और फिर मशीन चली तो खोदा पहाड़ निकली चूहिया। खास बात यह है कि 40 प्रतिशत ट्यूबवेल का सूखा निकलना रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल है।
जानकारी के अनुसार जिले में पेयजल संकट को देखते हुए ट्यूबवेल की स्वीकृति दी गई। भूजल विभाग ने संबंधित स्थानों पर जल उपलब्धता होने का दावा करते हुए फिजिबिलिटी रिपोर्ट सौंपी। इन्हीं रिपोर्टों के आधार पर कार्य शुरू किया गया, लेकिन जब ड्रिलिंग हुई तो हकीकत सामने आई। हर तीसरा ट्यूबवेल सूखा निकला। सवाल यह है कि अगर जमीन के नीचे पानी नहीं था तो फिजिबिलिटी रिपोर्ट किस आधार पर बनाई गई। कई स्थानों पर पहले से ही भूजल स्तर बेहद नीचे था, इसके बावजूद वहां ट्यूबवेल स्वीकृत कर दिए गए। इससे न केवल सरकारी राशि को नुकसान हुआ, बल्कि ग्रामीणों की पानी की उम्मीद भी टूट गई।
सबसे गंभीर बात यह है कि विभाग अब तक इस मुद्दे पर स्पष्ट जवाब देने से बचता नजर आ रहा है। न तो किसी जांच की घोषणा हुई है और न ही फिजिबिलिटी रिपोर्ट तैयार करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय की गई है। जिले में चौमहला के वार्ड संख्या 13 शनि मंदिर क्षेत्र में ट्यूबवेल, डग में कांच वाले हनुमान मंदिर के पास, मालखेड़ा गांव में पानी की खेल के पास, चांगडिया गांव में पाटीदार धर्मशाला, झालावाड़ में राजस्व विश्रांति भवन, तीतरवासा ग्राम पंचायत के तीतरी गांव की मेघवाल बस्ती, किशनपुरा उर्फ मोग्याबेह गांव में प्राथमिक स्कूल व आमेठा में बालाजी मंदिर क्षेत्र में ट्यूबवेल सूखे पाए गए। ऐसे में अब इन क्षेत्रों के लोगों को पेयजल के लिए परेशान ही होना पड़ेगा।
जिओ फिजिकल सर्वे होता है जो पीएचईडी हमसे करवाती है। कहीं न कहीं इनकी कार्यप्रणाली में गैप होता है जिसके चलते सर्वे जल्दबाजी में हो पाता है। या यह लोग प्रॉपर जगह नहीं बता पाते हैं। इसीलिए ट्यूबवेल सूखने की प्रॉब्लम आती है। प्राइवेट मशीनों से ड्रिलिंग करवा लेते हैं, जबकि हमारे विभाग में ड्रिलिंग मशीनें मिलती हैं।

- अनिल कुमार पालीवाल, भूजल वैज्ञानिक, झालावाड़
भू जल विभाग की रिपोर्ट आने के बाद ही हम ट‌्यूबवेल खोदने का काम करते हैं। यह रिपोर्ट भी वहीं से आईं थी।

- अमर सिंह मीणा, एक्सईएन, पीएचईडी, झालावाड़
एक ट्यूबवेल पर करीब 2 से 5 लाख रुपए खर्च आता है। ड्रिलिंग, मशीनरी, पाइपलाइन और लेबर सहित अन्य खर्च जोड़ने पर पर काफी सरकारी पैसा खर्च होता है। ऐसे में 8 ट्यूबवेलों का फेल होना सिर्फ तकनीकी असफलता नहीं, बहुत बड़ी राशि का नुकसान भी है।
Aima media jhalawar








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