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गौरव गोगोई की प्रेस कॉन्फ्रेंस से बढ़े सवाल, भूमि मुद्दा बना असम की राजनीति का केंद्र


कांग्रेस नेता गौरव गोगोई ने सोमवार को बहुप्रतीक्षित प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया, लेकिन यह संवाद स्पष्ट जवाबों से अधिक नए सवालों को जन्म देता दिखाई दिया। पाकिस्तान यात्रा को लेकर उठे सवालों पर गोगोई की दलीलें एकरूप नहीं रहीं। पहले उन्होंने कहा कि वे उन स्थानों को देखने गए थे, जहां उनकी पत्नी पहले जा चुकी थीं—जैसे शॉपिंग एरिया और पार्क—फिर बाद में उन्होंने यह तर्क दिया कि वे नवविवाहित पत्नी को अकेले नहीं भेजना चाहते थे, इसलिए साथ गए। वीजा विस्तार के मुद्दे पर भी कोई सीधा और स्पष्ट उत्तर सामने नहीं आया। सत्तापक्ष के दावों के अनुसार, गोगोई को प्रारंभ में केवल लाहौर के लिए वीजा जारी हुआ था, जिसे बाद में गृह मंत्रालय की सिफारिश पर बढ़ाया गया। इस पर ठोस स्पष्टीकरण के अभाव ने असम की राजनीति में बहस को और तेज कर दिया है। इसी बीच कांग्रेस ने असम के सबसे संवेदनशील और जमीनी मुद्दे—भूमि संकट—को चर्चा के केंद्र में ला दिया। पार्टी का कहना है कि आज असम के हजारों परिवार ऐसे हैं जिनके पास अपनी जमीन नहीं है और वे सरकार से भूमि पट्टा तथा सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। कांग्रेस का आरोप है कि गरीब और स्वदेशी असमिया समुदाय जहां जमीन के लिए संघर्ष कर रहा है, वहीं मुख्यमंत्री के विस्तारित परिवार के नाम पर लगभग 12,000 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया गया है। कांग्रेस ने यह भी दावा किया कि Kanchanjuri Tea Garden की जमीन, जिसे असम की पहचान और गौरव से जोड़ा जाता है, स्वदेशी लोगों से छीनी गई। आरोप है कि इसी क्षेत्र में लगभग 3,000 एकड़ में फैला एक भव्य लक्ज़री रिसॉर्ट “बनी ग्रीन्स” विकसित किया गया है। यह मुद्दा इसलिए भी संवेदनशील हो जाता है क्योंकि यह इलाका Kaziranga के आसपास स्थित है, जो असम की शान माना जाता है। पार्टी का कहना है कि जिन इलाकों में इस तरह के भूमि अधिग्रहण हुए हैं, वहां स्थानीय लोग अब खुलकर विरोध में सामने आ रहे हैं और कांग्रेस उनके साथ खड़ी है। कांग्रेस नेताओं ने दो टूक कहा कि वे असम की जमीन को लेकर कथित लालच और अनियमितताओं को लगातार उजागर करते रहेंगे।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में असम की राजनीति में भूमि का मुद्दा और अधिक तीखा होगा। एक ओर पाकिस्तान यात्रा और वीजा से जुड़े सवाल हैं, तो दूसरी ओर आम असमिया की जमीन और अधिकारों की लड़ाई—इन दोनों ने राज्य की सियासत को सीधे आम जनता के भावनात्मक और जीवन से जुड़े मुद्दों से जोड़ दिया है।

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