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पाथाखेड़ा की खदानों में बगावत: 'पहले हक, फिर काम' - ठेकेदारों की 'कमीशनखोरी' के खिलाफ मजदूरों का आर-पार का ऐलान

सारनी। कोयले की कालिख से सने हाथों ने अब अपनी तकदीर बदलने के लिए मुट्ठियां भींच ली हैं। सारनी के पाथाखेड़ा क्षेत्र की भूमिगत खदानों में पसीना बहाने वाले मजदूरों ने अब शोषण के खिलाफ ‘आर-पार’ की लड़ाई का बिगुल फूंक दिया है। सालों से दबे-कुचले इन श्रमिकों ने स्पष्ट कर दिया है कि "जब तक अधिकार सुरक्षित नहीं होंगे, कोई भी मजदूर मौत के मुहाने यानी भूमिगत खदान में नहीं उतरेगा।"

सोमवार को होने वाली प्रशासनिक बैठक से पहले क्षेत्र में तनाव और आक्रोश का माहौल है। यह केवल वेतन की लड़ाई नहीं, बल्कि उस संगठित लूट के खिलाफ एक युद्ध है जो ठेकेदारों द्वारा मजदूरों की मेहनत की कमाई पर डाका डालकर लड़ी जा रही है।

"बैंक खाते में अमीरी, जेब में फकीरी": ठेकेदारों की डिजिटल डकैती

इस आंदोलन का सबसे काला सच वह 'आर्थिक शोषण' है जिसे ठेकेदार बडी चालाकी से अंजाम दे रहे हैं। मजदूर नेताओं ने खुलासा किया है कि ठेका कंपनियां सरकारी रिकॉर्ड और श्रम कानूनों की आंखों में धूल झोंकने के लिए एक शर्मनाक खेल खेल रही हैं। दिखावे के लिए मजदूरों के बैंक खातों में 35,000 से 40,000 रुपये जमा किए जाते हैं। जैसे ही पैसा खाते में आता है, ठेकेदार या उनके गुर्गे मजदूरों पर दबाव बनाकर राशि निकलवाते हैं और मजदूर के हाथ में महज 12,000 से 13,000 रुपये थमा दिए जाते हैं। बाकी के 20-25 हजार रुपये सीधे ठेकेदारों की जेब में जाते हैं।

मजदूरों का कहना है कि उनकी जान जोखिम में डालकर कमाए गए पैसों से ठेकेदार अपनी तिजोरियां भर रहे हैं। यह सिर्फ वेतन विसंगति नहीं, बल्कि एक आपराधिक कृत्य है। मजदूरों ने मांग की है कि इस 'वसूली प्रथा' को तत्काल बंद किया जाए और अब तक अवैध रूप से काटी गई राशि उन्हें ब्याज सहित लौटाई जाए।

बिना 'पहचान' के मौत के कुएं में काम

वरिष्ठ मजदूर नेता प्रदीप नागले ने प्रबंधन को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा, "अब मजदूरों पर होने वाला अत्याचार बर्दाश्त की सीमा पार कर चुका है। जिस मजदूर के पास जॉइनिंग लेटर नहीं है, उसे खदान में उतारना उसे जानबूझकर खतरे में धकेलना है। बिना पहचान और दस्तावेजों के हम जोखिम भरे भूमिगत कार्य में नहीं उतरेंगे। पहले सुरक्षा और अधिकार, तभी काम होगा।"

मजदूरों का दर्द यह है कि बिना लिखित जॉइनिंग लेटर के वे कागजों पर 'अदृश्य' हैं। यदि खदान के भीतर कोई दुर्घटना हो जाए, तो ठेकेदार उन्हें अपना कर्मचारी मानने से ही इनकार कर देते हैं, जिससे वे हर तरह के वैधानिक लाभ और मुआवजे से वंचित रह जाते हैं।

जो हक है, वही चाहिए

श्रमिक नेता संतोष देशमुख ने बताया कि प्रशासन और ठेकेदारों के सामने जो मांगें रखी गई हैं, वे कोई भीख नहीं बल्कि उनका संवैधानिक अधिकार हैं। हर मजदूर को नियुक्ति पत्र तत्काल मिले। भविष्य की सुरक्षा के लिए पीएफ नंबर आवंटित हों। बैंक खाते में आया पूरा पैसा मजदूर का हो, न कि ठेकेदार का। श्रम कानूनों के तहत सुरक्षा किट और सुविधाएं। वेतन में की जा रही अवैध कटौती और वसूली बंद हो।

सोमवार फैसले का दिन

सोमवार को मजदूरों का एक उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल स्थानीय प्रशासन के साथ बैठक करेगा। यह वार्ता निर्णायक मानी जा रही है। मजदूरों ने प्रशासन को अल्टीमेटम दे दिया है—यदि ठोस समाधान नहीं निकला और ठेकेदारों की मनमानी पर लगाम नहीं लगाई गई, तो पाथाखेड़ा की खदानों का चक्का पूरी तरह जाम कर दिया जाएगा।

अब सबकी निगाहें इस वार्ता पर टिकी हैं। प्रशासन के पास दो ही विकल्प हैं, या तो वे ठेकेदारों की जेब भरने वाली व्यवस्था का साथ दें, या फिर उन मजदूरों का साथ दें जिनके पसीने से देश रोशन होता है। अगर हल नहीं निकला, तो खदानों में मशीनों का शोर नहीं, बल्कि इंकलाब के नारे गूंजेंगे।

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