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संसद में एक सत्ता पक्ष का सांसद निशिकांत दुबे ने संसद की गरिमा को गन्दगी मे बदल दिया।इतनी भद्दी और अश्लील सोच आज देश को शर्मशार कर दिया।

संसद में एक सत्ता पक्ष का सांसद निशिकांत दुबे ने संसद की गरिमा को गन्दगी मे बदल दिया।इतनी भद्दी और अश्लील सोच आज देश को शर्मशार कर दिया।
अश्लील कहानियां गढ कर आज समाज को गर्त मे धकेलने का काम किया है। ऐसी बात वही कर सकता है जिसकी मानसिकता ही अश्लील है। यही सोच से हमारा देश विश्व गुरु बनेगा।Apstin फ़ाईल की कहानियों से प्रेरित मानसिकता कभी कृष्ण और राधा के संबंधों को नही समझ सकता ।एडविना और नेहरु एक दुसरे के आत्मिक आकर्षण को अश्लीलता बताना -मानसिक दिवालियापन का प्रतिक है
नेहरु को शायद लोगों ने पढा नही। पढा भी तो लगता है समझा नही। एक विद्वान आदमी ही दुसरे विद्वान की जज्वात और सोच को समझ सकता है।
आईये आज ईस झुठ से पर्दा हटाया जाय।
समझते है पमेला हिक्स से जो एडविना की बेटी थी।पमेला ने बड़ी बारीकी से नेहरु-एडविना के संबंधों पर अपनी बात बारीकी से रखते हुए कहती हैं-
नेहरू–एडविना की कहानी एक भावनात्मक, आध्यात्मिक और बौद्धिक प्रेमकथा की तरह सामने आती है, जिसे वह अपनी किताब *“Daughter of Empire: Life as a Mountbatten” में कई प्रसंगों के ज़रिये बयान करती हैं
वह लिखती हैं कि 17 साल की उम्र में जब वह अपने माता‑पिता के साथ 1947 में भारत आईं, तो उन्होंने अपनी मां एडविना और पंडित नेहरू के बीच एक “profound relationship” जन्म लेते देखा ऐसा रिश्ता जिसमें दोनों एक‑दूसरे के अकेलेपन को समझते और भरते थे। एडविना को, पामेला के शब्दों में, नेहरू में वह “companionship and equality of spirit and intellect” मिला ।
पामेला बाद में नेहरू के वे निजी पत्र पढ़ती हैं जो उन्होंने उनकी मां को लिखे थे, और इन्हीं पत्रों से उन्हें अहसास होता है कि दोनों “कितनी गहराई से एक‑दूसरे से प्रेम और सम्मान करते थे” पत्रों की शुरुआत में स्नेहपूर्ण संबोधन, उनके लंबे विछोह की पीड़ा, और एक‑दूसरे को याद करने की व्यथा साफ झलकती है। एक पत्र का उल्लेख कई लेखों में आता है, जिसमें नेहरू स्वीकार करते हैं कि अचानक उन्हें महसूस हुआ कि उनके बीच “deeper attachment” है और कोई “अनियंत्रित शक्ति” है जो उन्हें एक‑दूसरे की ओर खींचती है, मानो एक परदा हट गया हो और वे बिना झिझक एक‑दूसरे की आँखों में देख सकते हों

इसी के साथ पामेला यह भी स्पष्ट करती हैं कि उनकी जिज्ञासा हमेशा यह जानने की रही कि क्या यह रिश्ता शारीरिक भी था, पर नेहरू के पत्रों को ध्यान से पढ़ने और अपने समय की परिस्थितियों को याद करने के बाद वह “पूरी तरह आश्वस्त” हो गईं कि यह प्रेम शारीरिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक और बौद्धिक था। उनका तर्क है कि न तो उनकी मां और न ही नेहरू के पास “physical affair” के लिए वक्त था, और न ही वह निजता, क्योंकि दोनों हमेशा स्टाफ, पुलिस और अन्य लोगों से घिरे रहते थे; ऐसे में छिपकर कोई शारीरिक संबंध निभाना व्यावहारिक रूप से असंभव था। लॉर्ड माउंटबेटन के ADC फ़्रेडी बर्नबी एटकिंस का बयान भी वह उद्धृत करती हैं, जो कहते हैं कि उनकी सार्वजनिक ज़िंदगी की प्रकृति देखते हुए यह “impossible” था कि वे किसी गुप्त शारीरिक संबंध में हों
किताब में पामेला एक और अहम पहलू बताती हैं उनके पिता लॉर्ड माउंटबेटन का रवैया। वह लिखती हैं कि उनके पिता अपनी पत्नी के नेहरू के प्रति गहरे लगाव से पूरी तरह वाक़िफ थे, लेकिन उन्होंने न केवल इसका सम्मान किया बल्कि इसे एडविना के लिए “नई खुशी” के तौर पर देखा, जिसने घर में चलने वाली उनकी रात‑रात भर की शिकायतों और तनाव को काफी हद तक कम कर दिया। पामेला याद करती हैं कि जब वे चारों – नेहरू, एडविना, लॉर्ड माउंटबेटन और वह खुद साथ टहलने निकलते, तो आगे‑आगे हमेशा नेहरू और एडविना गहरी बातचीत में डूबे चलते, और वह तथा उनके पिता जानबूझकर थोड़ा पीछे रह जाते, ताकि उन्हें कुछ निजता‑सा मिल सके; फिर भी उन्हें कभी यह महसूस नहीं हुआ कि उन्हें बाहर कर दिया गया है, क्योंकि उनके पिता “trusted them both” दोनों की नीयत और मर्यादा पर भरोसा करते थे
रिश्ते की गहराई दिखाने के लिए पामेला एक प्रतीकात्मक घटना भी सुनाती हैं: भारत छोड़ते समय एडविना ने सोचा कि वह अपना कीमती पन्ना (emerald) वाला अंगूठी नेहरू को दे दें, लेकिन उन्हें यक़ीन था कि वह कोई महंगी भेंट स्वीकार नहीं करेंगे; तब उन्होंने वह अंगूठी इंदिरा गांधी को दी और कहा कि अगर कभी उनके पिता आर्थिक संकट में हों क्योंकि वे अपनी आय का बड़ा हिस्सा दान में दे देते हैं तो यह अंगूठी बेचकर उनकी मदद करना। इस छोटे से प्रसंग के ज़रिये पामेला दिखाती हैं कि उनकी मां का स्वार्थहीन चिंता, सुरक्षा और देखभाल से भरा हुआ था, न कि महज़ रोमानी आकर्षण से
आख़िर में, पामेला के लिए यह रिश्ता किसी गुप्त घोटाले या स्कैंडल की कहानी नहीं, बल्कि दो ऐसे अकेले, संवेदनशील और ज़िम्मेदारी से बोझिल लोगों का मिलन है जिन्होंने एक‑दूसरे में समझ, सांत्वना और बराबरी का गहरा एहसास पाया। उनकी किताब में नेहरू–एडविना का प्रेम सत्ता, इतिहास और राजनीति के शोर के बीच एक शांत, आत्मिक और बौद्धिक संग-साथ के रूप में उभरता है, जिसे वह बिना सनसनीखेज़ी, लगभग कोमलता के साथ बयान करती हैं
नरेंद्र द्वारा संकलित
सोर्स -Nehru survives

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