शाजापुर: 'सुविधाहर' या सजा? नाले पर टिका मोबाइल टॉयलेट बना रहवासियों के लिए 'काल'!
शाजापुर/मध्य प्रदेश/8 फरवरी 2026। शहर के विकास के दावों की धरातल पर पोल खुलती नजर आ रही है। नई सड़क क्षेत्र में नगर पालिका द्वारा स्थापित एक 'पोर्टेबल टॉयलेट' अब विकास का प्रतीक नहीं, बल्कि स्थानीय निवासियों के लिए 'बीमारियों का घर' बन गया है। बिना किसी ठोस आधार के नाले पर टिका यह ढांचा न केवल बदबू का केंद्र है, बल्कि किसी बड़े हादसे को खुला निमंत्रण दे रहा है।
खिड़की खोलते ही 'नरक' के दर्शन: सांस लेना हुआ दूभर
स्थानीय निवासी हर्षवीर सिंह पंवार के घर की खिड़की अब उनके लिए मुसीबत का सबब बन गई है। नगर पालिका ने बिना किसी प्लेटफॉर्म के, सीधे नाले के ऊपर इस भारी-भरकम शौचालय को टिका दिया है। इसके दुष्परिणाम भयावह हैं:
* असहनीय दुर्गंध: शौचालय घर की खिड़की के ठीक बगल में होने से परिवार का घर में बैठना तक दूभर हो गया है।
* महामारी का खतरा: गंदगी और जमा मल-मूत्र के कारण क्षेत्र में संक्रामक बीमारियों के फैलने की पूरी आशंका है।
* सुरक्षा से खिलवाड़: बिना किसी बेस या सपोर्ट के नाले पर खड़े इस ढांचे के गिरने का डर बना हुआ है, जो कभी भी जानलेवा साबित हो सकता है।
प्रशासन को 'गुमराह' कर रंजिश भुनाने का खेल!
इस मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू 'व्यक्तिगत रंजिश' का सामने आया है। आरोप है कि स्थानीय रसूखदारों ने अपनी कुन्नस निकालने के लिए नगर पालिका अध्यक्ष और विधायक को गलत जानकारी देकर जानबूझकर इस संकीर्ण स्थान का चयन करवाया।
> "यह विकास नहीं, विनाशकारी सोच है। किसी के निजी आवास की खिड़की के पास बिना सूचना और बिना आधार के शौचालय रखना मानवाधिकारों का सीधा उल्लंघन है।"
> — हर्षवीर सिंह पंवार, पीड़ित निवासी
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CM हेल्पलाइन से कलेक्टर तक गुहार: क्या जागेगा प्रशासन?
प्रशासनिक चुप्पी से तंग आकर पीड़ित परिवार अब आर-पार की जंग लड़ रहा है। न्याय के लिए दरवाजे खटखटाए जा रहे हैं:
* कलेक्टर कार्यालय: 3 फरवरी 2026 को आवेदन (क्र. 274) देकर शौचालय हटाने की मांग की गई।
* CM हेल्पलाइन: मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 181 (पंजीयन क्र. 36600958) पर शिकायत दर्ज कर मामला भोपाल तक पहुँचाया गया है।
बड़ा सवाल: क्या हादसे के बाद खुलेगी नींद?
'पत्रिका न्यूज़ नेटवर्क' की 'मोहल्ला मीटिंग' का उद्देश्य शहर की बेहतरी था, लेकिन नगर पालिका के घटिया क्रियान्वयन ने पूरी योजना की फजीहत करा दी है। क्षेत्रवासियों का एक ही सुर में कहना है कि इस ढांचे को तुरंत किसी उपयुक्त सार्वजनिक स्थान पर शिफ्ट किया जाए।
अब जनता की नजरें जिला प्रशासन पर टिकी हैं—क्या कलेक्टर महोदय इस 'गुमराह' करने वाले खेल पर लगाम लगाएंगे, या फिर किसी बड़े हादसे और गंभीर बीमारी का इंतज़ार किया जाएगा?