✦ वेदांत 2.0 | LIFE ✦
✦ वेदांत 2.0 | LIFE ✦
जो सुधार का प्रवचन देता है —
वह भी मन है।
जो प्रवचन सुन रहा है —
वह भी मन है।
और मन
बेहोशी से बनता है,
होश से टूटता है।
गुरु और शिष्य बने रहो —
कुछ नहीं होगा।
यह भी माया है।
जहाँ होश जागता है,
वहाँ न गुरु चाहिए,
न शिष्य बचता है।