
कलम की ताक़त कमज़ोर हुई, धमकियों का शोर बढ़ा.... एक लेख
लेखक: जावेद शेख
उपसंपादक
राईट हेडलाईन्स नासिक
किसी भी अच्छे समाज की पहचान कलम से होती है, न कि डर और धमकी से। कलम सच बोलती है, सवाल पूछती है और सही-गलत का फर्क बताती है। लेकिन आज हालात ऐसे बन गए हैं कि कलम की आवाज़ धीमी पड़ती जा रही है और धमकियों का शोर तेज़ होता जा रहा है।
आज अगर कोई सच लिखता है या सवाल उठाता है, तो उसे चुप कराने की कोशिश होती है। डर दिखाया जाता है, दबाव बनाया जाता है। इससे माहौल खराब होता है और लोग खुलकर बोलने से घबराने लगते हैं। जब डर फैलता है, तो सच्चाई सबसे पहले घायल होती है।
कलम का काम किसी से लड़ना नहीं, बल्कि समाज को सही रास्ता दिखाना है। लेकिन जब आलोचना को दुश्मनी समझ लिया जाए, तो बातचीत खत्म हो जाती है। फिर तर्क की जगह गुस्सा और समझ की जगह ज़ोर-ज़बरदस्ती आ जाती है।
धमकियां कुछ देर के लिए आवाज़ दबा सकती हैं, लेकिन सच को हमेशा के लिए नहीं मिटा सकतीं। सवाल ज़िंदा रहते हैं और एक दिन फिर सामने आते हैं। इतिहास गवाह है कि डर से कोई समाज आगे नहीं बढ़ा।
आज ज़रूरत है कि हम कलम की अहमियत को समझें। बोलने और लिखने की आज़ादी का सम्मान करें। मतभेद हों, लेकिन बातचीत से हल निकले, धमकी से नहीं।
अगर कलम खामोश हो गई, तो समाज गूंगा हो जाएगा।
और जब धमकियों का शोर बढ़ता है, तो इंसानियत सबसे ज़्यादा टूटती है।