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लोकसभा मे बहस:: चर्चा थी भारत चीन संबंधों की ,मोदी सरकर की नीति की ;तो फिर नेहरु क्यूँ? जब जब सवाल मुश्कील होता है तब तब नेहरु याद आता है।

लोकसभा मे बहस::
लोकसभा में हुए विवाद की पूर्ण और ताज़ा जानकारी — विशेषकर बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे के नेहरू-गांधी परिवार पर बयानों के बारे में,- जो राहुल गांधी के किताब- विवाद के सिलसिले में आए हैं। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने लोकसभा में पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम एम नरवणे की अप्रकाशित किताब (Four Stars of Destiny) के कुछ अंशों का हवाला देते हुए सरकार से सवाल पूछना चाहा, खासकर 2017 डोकलाम समेत राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों पर।सरकार और अध्यक्ष ने ऐतिहासिक तौर पर यह कहा कि अप्रकाशित किताब को पारदर्शी तरीके से उद्धृत नहीं किया जा सकता।यहीं से विवाद शुरू हुआ। इसी बहस के बीच भाजपा के लाडले सांसद निशिकांत दुबे ने लोकसभा में कहा कि राहुल गांधी एक अप्रकाशित किताब पर जोर डाल रहे हैं, जबकि उन्होंने खुद कई प्रकाशित किताबों के उद्धरण सदन में लाए है।दुबे ने कहा कि वह राहुल गांधी के एक किताब के बजाय, 100 प्रकाशित किताबें लेकर आए हैं जिनमें उन्होंने नेहरू-गांधी परिवार के इतिहास, भ्रष्टाचार, मक्कारी, और अन्य आरोपों का उल्लेख किया है।
दुबे ने भाषण में आरोप लगाया कि:
“नेहरू जी … aiyyashi (ऐशो-आराम), मक्कारी (चालाकी), bhrashtachar (भ्रष्टाचार) में लिप्त रहे।” उन्होंने नेहरू, इंदिरा गांधी और कांग्रेस परिवार से जुड़ी किताबों का जिक्र करते हुए कहा कि इन किताबों में उनके शासन-काल की कथित विफलताओं और कांडों का विवरण है। उन्होंने। ऐडवीना&नेहरु, ‘The Accidental Prime Minister’, Bofors और Mitrokhin Archive जैसी किताबों को उदाहरण के रूप में बताया और कहा कि इनसे “वास्तविक इतिहास” सामने आता है। उनके भाषण के दौरान अध्यक्ष ने कई बार हस्तक्षेप किया और सदन की कार्यवाही को कुछ समय के लिए स्थगित (adjourn) तक करना पड़ा, क्योंकि विपक्ष ने इसे अनुचित और विषय-विहीन बताया।इसी के बाद दुबे ने नेहरू-गांधी परिवार पर आधारित “misdeeds library” बनाने की घोषणा की, जहाँ वह उनके खिलाफ प्रकाशित और कथित तौर पर प्रतिबंधित पुस्तकों को एकत्र करने की बात कह रहे हैं। लोकसभा में विवाद का केंद्र अपनी बात साबित करने के लिये उद्धृत किताबों का स्रोत और संसदीय नियमों का पालन रहा। विपक्ष ने कहा कि नियमों का दुरूपयोग कर बातचीत रोकी जा रही है। यह बहस इतिहास और वर्तमान सरकार की जवाबदेही दोनों से जुड़ी है:विपक्ष इसे लोक संसद की आज़ादी पर अंकुश के रूप में दिखा रहा है।
सरकार के समर्थक इसे इतिहास की गलत धारणाओं से देश को सचेत करने का प्रयास मानते हैं।मामला संसदीय नियम, राजनीति और रणनीति का था।लोकसभा में बहस मनमानी नहीं होती।वहाँ तीन चीज़ें सबसे ज़्यादा मायने रखती हैं:संसदीय नियम,विषय की प्रासंगिकता और सरकार की जवाबदेही।संसदीय नियम क्या कहते हैं? सांसद किसी दस्तावेज़/किताब का हवाला दे सकता है,लेकिन अध्यक्ष को यह अधिकार है कि वह तय करे कि वह सदन के रिकॉर्ड में जाएगा या नहीं।प्रकाशित किताब — ज़्यादा स्वीकार्य
अप्रकाशित किताब — विवादास्पद बहस जिस विषय पर शुरू हुई,उसी विषय पर रहनी चाहिए। व्यक्तिगत आरोप ,अपमानजनक भाषा और विषय से भटकाव— ये सब असंसदीय माने जाते हैं। सत्ता पक्ष का कर्तव्य है
कि वह सवाल का जवाब दे,न कि इतिहास का पाठ पढ़ाए।
कांग्रेस का तर्क क्या है? राहुल गांधी ने
कोई आरोप नहीं लगाया,उन्होंने एक पूर्व सेना प्रमुख के कथन के आधार पर सवाल पूछा। सवाल था:चीन की घुसपैठ ,डोकलाम सीमा सुरक्षा और सरकार की रणनीति।
किताब अप्रकाशित है,लेकिन लेखक भारत के पूर्व सेना प्रमुख हैं, यानी बयान हल्का नहीं है।कांग्रेस कहती है:
“अगर किताब गलत है, तो तथ्य से खंडन कीजिए,नेहरू को गाली क्यों?”
बीजेपी का तर्क है की अप्रकाशित किताब का हवाला देकर सदन को गुमराह करने की कोशिश राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषय पर गैर-जिम्मेदार बयान ,इसलिए बोलने से रोका गया। अब राष्ट्रिय सुरक्षा के विषय पर बहस संसद मे नही होगी तो फिर क्या सडकों पर होगी? उन्होनें आगे कहा: कांग्रेस का इतिहास सवालों के घेरे में रहा है नेहरू-गांधी काल में गलत फैसले हुए।देश को “सच” जानना चाहिए।बीजेपी ने कांग्रेस के सवाल का सीधा जवाब नहीं दिया
निशिकांत दुबे ने विषय बदला व्यक्तिगत आरोप लगाए असंसदीय भाषा का प्रयोग किया।इससे सरकार की तकनीकी दलील कमजोर पड़ गई।सवाल है की
क्या निशिकांत दुबे का भाषण संसदीय था?ईमानदारी से जवाब: नहीं।क्यों?बहस चीन पर थी भाषण नेहरू पर चला गया,शब्द मर्यादा से बाहर थे,इतिहास को हथियार बनाया गया इसीलिए: विपक्ष भड़का ,अध्यक्ष को हस्तक्षेप करना पड़ा और सदन स्थगित करना पड़ा।
यह रणनीति क्यों अपनाई जाती है?क्योंकि यह राजनीतिक रूप से फायदेमंद होती है: समर्थक भावनात्मक हो जाते है और असली सवाल दब जाता है।लेकिन सच्चाई से जनता को ज्यादा समय तक दुर नहीं रखा जा सकता।
मीडिया का फोकस बदल जाता है और सरकार जवाब से बच जाती है।इसे ही कहते हैं डायवर्जन पॉलिटिक्स। (असली गम्भीर मुद्दो से जनता का ध्यान हटाना)
कांग्रेस का सवाल:“आज सरकार क्या कर रही है?
”बीजेपी का जवाब:“कल नेहरू ने क्या किया था?”
लोकतंत्र में इतिहास पर बहस हो सकती है
लेकिन इतिहास की आड़ में सत्ता नहीं चल सकती।नेहरू अब इतिहास हैं,मोदी सरकार वर्तमान है —और संसद वर्तमान से जवाब मांगती है।
नरेंद्र

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