
उत्तराखंड देहरादून खटक रहे हैं जिला अधिकारी संविन बंसल काम न करने वालों की आंखों
डीएम विवाद पर उठते सवाल और हकीकत: जनता के काम से “खटक” रहे हैं जिलाधिकारी?
राजधानी देहरादून में इन दिनों जिलाधिकारी महोदय को लेकर लगातार अलग-अलग खबरें सामने आ रही हैं। कहीं “गाड़ी अधिग्रहण” को लेकर सवाल उठ रहे हैं तो कहीं प्रशासनिक फैसलों को लेकर विवाद खड़ा करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन सवाल उठाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है उन सवालों के पीछे की सच्चाई और तथ्य सामने लाना।
आज आम जनता के मन में भी कुछ सवाल हैं, जिनका जवाब जानना जरूरी है ताकि अफवाह और भ्रम के बीच सच साफ दिखाई दे।
पहला सवाल: क्या सिर्फ क्लेमेंट टाउन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी की गाड़ी का ही अधिग्रहण हुआ?
कुछ खबरों में यह दावा किया जा रहा है कि जिला प्रशासन ने जल्दबाजी में केवल क्लेमेंट टाउन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) की गाड़ी का अधिग्रहण किया है। लेकिन यहां बड़ा सवाल यह है कि—
क्या अधिग्रहण सिर्फ एक ही अधिकारी की गाड़ी का हुआ?
अगर प्रशासनिक जरूरत के तहत वाहन की मांग की गई है, तो यह प्रक्रिया किसी एक व्यक्ति को निशाना बनाने के लिए नहीं, बल्कि सरकारी कार्यों को गति देने के लिए की जाती है।
प्रशासनिक व्यवस्था में कई बार आपातकालीन परिस्थितियां, चुनाव ड्यूटी, वीआईपी मूवमेंट, कानून व्यवस्था, आपदा प्रबंधन, निरीक्षण कार्य या अन्य सरकारी आवश्यकताओं के लिए वाहनों की जरूरत पड़ती है। ऐसे में जिला प्रशासन के पास अधिकार होता है कि वह नियमानुसार संसाधन जुटाए।
क्या राजधानी में पहली बार ऐसा हुआ है?
यह भी कहा जा रहा है कि “पहली बार” ऐसा हुआ है। जबकि सच्चाई यह है कि देहरादून ही नहीं, प्रदेश के कई जिलों में सरकारी कार्यों के लिए वाहन की मांग/व्यवस्था पहले भी होती रही है।
यह कोई नई बात नहीं है, बल्कि प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है—बस फर्क इतना है कि अब इस पर राजनीति और बयानबाजी ज्यादा हो रही है।
दूसरा सव