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*"आर एस एस – काया और माया” : हिन्दुत्व वर्चस्ववाद के अतीत का गंधाता कुआं* *(पुस्तक समीक्षा : सुभाष गाताडे)*


*प्रकाशनार्थ*

*"आर एस एस – काया और माया” : हिन्दुत्व वर्चस्ववाद के अतीत का गंधाता कुआं*
*(पुस्तक समीक्षा : सुभाष गाताडे)*

धर्मान्ध लोग – जो हंसना भूल गए हैं, रोना भूल गए हैं, और करूणा भूल गए हैं – ऐसे इंसान हैं, जो एटम बम से भी ज्यादा ख़तरनाक हैं। – पी लंकेश के काॅलम ‘कहीं मैं भूल न जाऊं’ से (पेज 6, ‘आर एस एस – काया और माया’ में उल्लेखित)

रामलीला, उत्तर भारत के गांवों-कस्बों में आज भी मंचित होती है। जिस किसी ने भी इस मंचन को देखा होगा, उसने एक दृश्य पर अवश्य गौर किया होगा। जहां एक ऋ़षि बाकायदा गर्दभ अर्थात गधे के शक्ल में हाजिर होते दिखते हैं, सूत्रधार बताता है कि अपने किसी दुराचरण के लिए उन्हें यह शाप मिला है और खुद उन्हें इस बात का एहसास नहीं है कि वह कैसे दिखते हैं।

जब भी कोई व्यक्ति या संघ/संगठन अपनी कथित उपलब्धियों को लेकर ऐसे दावे करने लगता है, जिनका वास्तविकता से कोई रिश्ता नहीं होता, मुझे यह कहानी बार-बार याद आती है।

दक्षिण एशिया के इस हिस्से में हिन्दुत्व वर्चस्वशाली आंदोलन के अग्रणी – जो अपनी स्थापना की सदी मना रहे हैं – अक्सर यह दावे करते मिलते हैं कि उनके राजनीतिक पुरखों ने आजादी के आंदोलन में कितनी अहम भूमिका अदा की, तब उपरोक्त प्रसंग का याद आना स्वाभाविक है।

आज़ादी के आंदोलन के इतिहास का हर वस्तुनिष्ठ अध्ययन, जिसे लेकर सैंकड़ों किताबें लिखी गयी है और हजारों दस्तावेज, जो देश के अग्रणी संस्थानों में जमा हैं, वह बार-बार इसी सच्चाई को रेखांकित करते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके स्वयंभू रणबांकुरे संस्थापक सदस्य किस तरह समझौतापरस्ती में लगे थे, क्रांतिकारी आंदोलन को बदनाम कर रहे थे, अंग्रेज आकाओं के सामने अपनी वफादारी के सबूत पेश कर रहे थे और सबसे बढ़ कर औपनिवेशिक शासकों के खिलाफ सभी समुदायों की जो चट्टानी एकता कायम हो रही थी, उसमें तरह-तरह से सेंध लगा रहे थे।

1942 का जब ऐतिहासिक भारत छोड़ो आंदोलन जारी था और हजारों गुमनाम लोग अपनी जान और अपना सर्वस्व कुर्बान कर रहे थे, इनके आका मुस्लिम लीग के साथ मिल कर बंगाल में और भारत के पश्चिमी प्रांतों में मिली-जुली सरकारें चला रहे थे और स्वतंत्रता आंदोलन का दमन किस तरह किया जाए, इसे लेकर अंग्रेज सरकार को सलाह दे रहे थे।

वैसे संघ अपने बारे में जो कुछ भी दावा करे, देश के अग्रणी चिंतकों – विद्वानों – सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उसकी असलियत को सामने लाने की लगातार कोशिश की है और तमाम चुनौतियों के बावजूद उसको उजागर किया है।

कन्नड भाषा के अग्रणी साहित्यकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता देवनूर महादेव की हिन्दी में प्रकाशित ताज़ा किताब ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ – काया और माया’ ('आरएसएस : आलू मत्तू अगला‘ नाम से मूल कन्नड़ में प्रकाशित किताब का हिंदी अनुवाद है, जिसे स्वाति कृष्णा ने किया है।) इस मामले में एक नया पत्थर गाड़ती प्रतीत होती है।

जैसा कि सभी जानते हैं वर्ष 2022 में मूल कन्नड में प्रकाशित इस किताब ने हाल के समय में बिक्री का रेर्कार्ड कायम किया है, वह न केवल कन्नड, तेलूगू, मराठी, अंग्रेजी, हिन्दी में प्रकाशित हुई है, बल्कि इस किताब को काॅपीराइट से मुक्त करके और लोगों को प्रकाशन की छूट देकर संघ के असली स्वरूप को जन-जन तक पहुंचाने में इस किताब ने वितरण के मामले में और किताब या संघ के बारे में चर्चा होने के मामले में एक किस्म का मील का पत्थर कायम किया है।

कन्नड़ और तेलुगु में इसकी एक लाख से भी अधिक प्रतियां बिकी हैं और अन्य जुबानों में दसियों हज़ार से अधिक प्रतियां।

ध्यान रहे कि जिस बेबाकी से देवनूर महादेव ने संघ के बारे में लिखा है, उतनी साफगोई बहुत कम लोग दिखा पाते है। किताब की भूमिका ही इस बात को उजागर करती है। वे लिखते हैं : ‘.. आर एस एस इस देश को कहां ले जाने की कोशिश कर रहा है ? इस संगठन के बारे में आम धारणा और इस संगठन के असली चाल-चरित्र के बीच फर्क क्या है? इस सवालों पर जनमानस को जागृत करने’ (पेज 23-24) के लिए यह किताब लिखी गयी है। भारतीय लोककथाओं में चर्चित मायावी की कथा के बहाने जिसकी जान सात समुंदर पार किसी तोते में समायी होती है, जो बहुरूपिया है और मानव लोक में तरह-तरह की ज्यादतियां करता है और उसका कोई कुछ बिगाड़ नहीं पाता, क्योंकि उसकी जान ‘तोते के रूप में गुफा में सुरक्षित है’ वह संघ की असलियत जानने और उजागर करने के लिए ‘आरएसएस के अतीत के गंधाते कुएं में' (पेज 23) झांकने के लिए निकले हैं और दिखाई दिए ‘भयावह दृश्य' (पेज 24) का एक अंश किताब के रूप में सामने ला रहे हैं।

किताब का पहला अध्याय ‘झांके एक पुराने गंधाते कुएं में’ दरअसल संघ के दूसरे सुप्रीमो रहे माधव सदाशिव गोलवलकर और हिन्दु महासभा के अध्यक्ष और संघ के संस्थापक डॉ हेडगेवार के ‘गुरू, दार्शनिक और मार्गदर्शक’ सावरकर के कुछ उद्धरणों के माध्यम से संघ की विचार प्रणाली को उजागर करता है।

पहला ही उद्धरण ‘गोलवलकर के भगवान’ शीर्षक से है जिसमें ‘..हिन्दू धर्म ही हमारा भगवान है, स्वयं सर्वशक्तिमान की अभिव्यक्ति है।’ का ऐलान करते हुए पुरुष सूक्त में वर्णित सर्वशक्तिमान के वर्णन से उसकी मान्यता को उजागर करते हैं। याद रहे ‘ऋग्वेद 10.90.12’ में वर्णित श्लोक ‘ब्राहमणोस्य मुखोमासीदू …’ यही बताता है कि ‘ब्राहमण उसका मुख, क्षत्रिय भुजाएं, वैश्य उसकी जंघाएं तथा शूद्र पैर हैं। इसका अर्थ है कि समाज, जिसमें यह चतुर्वर्ण व्यवस्था है, अर्थात हिन्दू समाज हमारा ईश्वर है।’ – (विचार नवनीत, पंचम संस्करण, पृष्ठ 37-38, ज्ञानगंगा प्रकाशन, जयपुर ).

सावरकर द्वारा मनुस्मृति की हिमायत, उनके द्वारा ‘मनुस्मृति ही हिन्दू कानून है’ की घोषणा (पेज 29), उनके द्वारा नात्सी और फासीवादी विचारधारा की भूरी-भूरी प्रशंसा में वह संकोच नहीं करते : ‘जर्मन नस्ल का गौरव आज चर्चा का विषय है। नस्ल की शुद्धता और उसकी संस्कृति को बनाए रखने के लिए यहूदियों का सफाया करके जर्मनी ने सारी दुनिया को हैरान कर दिया है। नस्ल का गौरव यहां अपनी पराकाष्ठा में प्रकट हुआ है। जर्मनी ने यह भी दिखाया है कि जिन नस्लों और संस्कृतियों में मूलभूत भिन्नताएं है, उनका एक सम्पूर्ण इकाई में घुलमिल जाना असंभव है। यह हम हिन्दुस्तान में रहने वालों के लिए एक अच्छा सबक है और हमें इससे लाभ उठाना चाहिए।' (पेज 30).

दिलचस्प है कि अगला ही उद्धरण गोलवलकर की किताब ‘वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइन्ड’, 1939 का है, जिसमें वह ‘अल्पसंख्यकों से सम्बधित अपनी समस्या का समाधान करने के लिए’ …इन राष्ट्रों के नक्शेकदम पर चलने की बात करते हैं, जो उनके हिसाब से ‘राष्ट्र को उस कैंसर के ख़तरे से बचाए रख सकता है, जो इसके राजनीतिक शरीर में, राज्य के भीतर राज्य बनाने के कारण पनप रहा है। (पेज 31)

इस अध्याय का आखिरी हिस्सा गोलवलकर के उद्धरणों पर केन्द्रित है, जो आजाद भारत में संविधान निर्माण पर भारत के संघीय स्वरूप के प्रति संघ के नफरती सोच को प्रकट करते हैं। संघ हिन्दुत्व की समूची जमात के प्रगट विरोध को उजागर करते हुए, संविधान के स्थान पर मनुस्मृति को ही स्थापित करने (पेज 32-33) पर बल देते हैं।

भारत के संघीय स्वरूप के बारे में संघ के विचार को ‘विष के बीज’ शीर्षक के साथ उल्लेख करते हुए लेखक गोलवलकर को उद्धृत करते हैं (पेज 33, 34) : ‘संघीय स्वरूप वाले संविधान की रचना से ही स्पष्ट है कि हमारे आज के संविधान के निर्माताओं को यह पक्का विश्वास नहीं था कि हमारी एक राष्ट्रीयता तो सबको एक कर देने वाली है। इसलिए हमारे देश को राज्यों का संघ कहा गया। इस संघीय व्यवस्था में भी विघटन के बीज हैं।' (विचार नवनीत, पृष्ठ 227).

गोलवलकर यहीं नहीं रूकते, वह बाकायदा ‘अपने देश के संविधान के सांघिक ढांचे की सम्पूर्ण चर्चा को सदैव के लिए समाप्त कर देने की सलाह देते हैं’ और ‘एक देश, एक राज्य, एक विधानमंडल, एक कार्यपालिका घोषित करने’ ..‘संविधान के पुनः परीक्षण एवं पुनर्लेखन और ‘सुढृढ़ता से ... वर्तमान विकृत ढांचे को एकात्मक शासन में परिवर्तित कर देने’ पर जोर देते हैं। (विचार नवनीत, 229-30).

दूसरा अध्याय ‘सुनें नफरत की कहानी : दस्तावेजों की जुबानी’ शीर्षक से है, संघ के बारे में अपनी इसी पड़ताल को आगे बढ़ाता है। अध्याय के प्रारंभ में ही वह गोलवलकर द्वारा रचित दूसरी किताब ‘विचार नवनीत’ ('बंच ऑफ थाॅटस’)का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि ‘इसमें ऐसा कुछ नहीं मिलता ,जिसे थाॅटस या चिन्तन कहा जा सके। मिले तो सिर्फ..खतरनाक विचार, वो भी अतीत के सबसे ख़तरनाक विचार।'

पहला ‘पुरूष सूक्त में वर्णित सामाजिक व्यवस्था ही इनके लिए भगवान है’ (पेज 35) का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि ‘चातुर्वर्ण्य का यह देवता किस तरह काम करता है यह देखने के लिए हम अपने सिर, भुजा, जांघ और पैरों की तरफ देख लें, यही काफी है।' (पेज 36).

वह यह बताना नहीं भूलते कि इस भगवान को छोटे-छोटे बच्चों के मन में स्थापित करने के लिए, भाजपा की राज्य सरकारें गीता को स्कूली पाठयक्रम में शामिल करती जा रही हैं, जिस गीता में भगवान के अवतार कृष्ण स्वयं यह घोषित करते हैं कि चातुर्वर्ण्य व्यवस्था मेरे द्वारा बनाई गई है, (चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुण कर्म विभागशः)’।

इसके बाद वह विवेकानन्द के ‘गीता पर विचार’ से एक संदर्भ देकर (देखें, विवेकानंद साहित्य, सप्तम खंड, पृष्ठ 314-15, प्रकाशन – अद्धैत आश्रम, कोलकाता) इस सच्चाई को उजागर करते हैं कि किस तरह ‘चातुर्वर्ण्य की असमानता, गुलामगिरी को अधिकृत करने के लिए ही यह तरकीब निकाली गई कि उसे स्वयं भगवान के मुंह से कहलवाया गया।’

यह समीचीन होगा कि गीता की प्रामाणिकता के बारे में विवेकानंद के कथन को उद्धृत किया जाए : ‘… साधारण जनता को गीता के विषय में तब तक अधिक जानकारी नहीं थी, जब तक शंकराचार्य ने उस पर अपना भाष्य लिखकर उसे विख्यात नहीं कर दिया। बहुतों का कहना है कि उससे पहले उस पर बोधायन का भाष्य प्रचलित था। ...किन्तु भारत भर में भ्रमण करते समय मुझे वेदान्त सूत्र पर बोधायन भाष्य की कोई प्रति नहीं मिली। … कहा जाता है कि रामानुज तक ने कीड़ों-मकौड़ों से खाई हुई एक हस्तलिखित प्रति से, जो संयोग से उन्हें मिल गई थी, अपने भाष्य को संकलित किया।'

जब वेदान्त सूत्र पर लिखा गया बोधायन का यह भाष्य भी अनिश्चितता के अंधकार में इतना ढंका हुआ है, तब गीता पर बोधायन भाष्य के अस्तित्व को प्रमाणित करने का प्रयास व्यर्थ है। कुछ लोग यह निष्कर्ष निकालते हैं कि गीता के रचनाकार शंकराचार्य थे और उन्होंने ही उसे महाभारत में प्रक्षिप्त कर दिया। (वही)

अपनी विवेचना को आगे बढ़ाते हुए लेखक संघ की कम उल्लेखित या चर्चित विशिष्टताओं, चिन्तन की विकृतियों तथा आक्रामकता की कई मिसाल सामने लाते हैं, जिनमें से एक है ‘आर्य नस्ल की श्रेष्ठता का दिली जूनून’ (पेज 40) । नस्ली शुद्धता की अपनी सोच में संघ के दूसरे सुप्रीमो गोलवलकर का हवाला देते हुए बताते हैं कि वह ‘हिटलर से भी एक कदम आगे थे’, जिनके मुताबिक
‘सनातन भारत में आर्य नस्ल में सुधार के प्रयोग प्राचीन काल से चल आते रहे हैं।’ (वही).

अपनी बात को वह पुष्ट करते हैं गुजरात विश्वविद्यालय में गोलवलकर द्वारा छात्रों को दिए सम्बोधन का उल्लेख करते हुए (गोलवलकर, आर एस एस के मुखपत्र ‘आर्गनायजर’ के 2 जनवरी 1961 के अंक में उल्लेखित)। गोलवलकर के मुताबिक ‘‘..क्राॅस बीडिंग के माध्यम से मानव प्रजातियों को बेहतर बनाने के लिए नम्बूदरी ब्राहमण केरल में बसाए गए और यह नियम निर्धारित किया गया कि नम्बूदरी परिवार का सबसे बड़ा बेटा केरल के वैश्य, क्षत्रिय या शुद्र समुदायों की बेटी से ही शादी कर सकता है। और एक साहसी नियम यह था कि किसी भी वर्ग की विवाहित महिला की पहली सन्तान नम्बूदरी ब्राहमण से ही पैदा होनी चाहिए।" (वही).

संघ की कार्यप्रणाली में निहित छल-कपट को उजागर करने के लिए लेखक डॉ. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा 14 मार्च 1948 को गृह मंत्री वल्लभभाई पटेल को लिखे पत्र का हवाला देते हैं, (पेज 42)। याद रहे, वह दौर बंटवारे के बाद भारत के विभिन्न हिस्सों में फैलती हिंसा, दंगों से उपजी आपसी हिंसा का है : ‘मुझे ऐसी सूचना मिली है कि आरएसएस के लोगों ने दंगा कराने की योजना बनाई है। वे अपने लोगों को मुसलमान का भेस धारण कराते हैं, ताकि वे मुसलमान दिखें। इनको हिन्दुओं पर हमला करके, दंगे शुरू करके हिन्दुओं को भड़काने का काम दिया गया है। इसी प्रकार आरएसएस से प्रेरित हिन्दू, मुसलमानों पर हमले करके दंगे भड़काते हैं। हिन्दू और मुसलमान के बीच इस तरह के दंगे बहुत बड़ी आग को जन्म देंगे।(डा. राजेन्द्र प्रसाद : कारस्पोंडस एण्ड सेलेक्ट डाॅक्युमेंटस ; नई दिल्ली, एलाइड पब्लिशर्स, 1987, वाल्यूम 9, पृष्ठ 73).

हिन्दुत्व वर्चस्ववादी आंदोलन के लोग – जो अलग-अलग नाम से सक्रिय हैं – उन्होंने छल कपट के इन तरीकों से आज तौबा किया हो, यह भी नहीं दिखता। आप को याद होगा, जब पहलगाम में आतंकी हमला हुआ, उसके बाद देश के अलग-अलग भागों से यह ख़बरें आने लगीं कि किस तरह सुनियोजित तरीके से अल्पसंख्यक विरोधी माहौल बनाने के लिए तरह-तरह की छोटी हिन्दुवादी जमातों के कार्यकर्ता दंगों को भड़काने की योजना में पकड़े गए थे।

‘आरएसएस एण्ड बीजेपी : ए डिवीजन आफ लेबर’ शीर्षक से कानूनविद ए जी नूरानी की एक किताब कुछ साल पहले प्रकाशित हुई थी, जिसमें विभिन्न आनुषंगिक संगठनों के माध्यम से इस ‘परिवार’ में काम के बंटवारे पर रौशनी डाली गई थी। प्रस्तुत किताब भी ‘भूतों (भूतकाल) को कब्र से निकाल कर वर्तमान बनाने में जुटे संगठनों में’ आरएसएस और उसकी छत्रछाया में पल रही इसकी कई संतानों का विवरण पेश करती है, जिसका विवरण ‘..संघ से सम्बद्ध सुरूचि प्रकाशन की तरफ से 1997 में आयी किताब ‘परम वैभव के पथ पर' में दिया गया था।

आरएसएस की संतान में भारतीय जनता पार्टी, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, हिन्दू जागरण मंच, संस्कार भारती, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल आदि लगभग 40 संगठनों का उल्लेख है, (पेज 46). गौरतलब है कि यह सभी आनुषांगिक संगठन ‘संघ परिवार के ही अंग है, मगर इसका फायदा यह है कि ‘जब कभी कोई अंग-संगठन अपने हमलों की वजह से बदनाम होता है, तो आरएसएस यह कहकर पिंड छुटा लेता है कि ‘इससे हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है।' (पेज 46)

लेखक के मुताबिक ‘आरएसएस की सबसे भयानक बात यह है कि वह अपने स्वयंसेवकों को किस तरह इस्तेमाल करता है। गोलवलकर के भाषण (सिंडी, वर्धा, 16 मार्च 1954) का हवाला देते हुए वह कहता है कि ‘यहां गोलवलकर कहते हैं कि विवेक की जरूरत ही नहीं है।.. वे इंसान नहीं बना रहे हैं, स्वयंसेवक नामक अमानवीय रोबोट तैयार कर रहे हैं। (पेज 47)

अध्याय के अंतिम हिस्से में वह व्यापक हिन्दू समाज का आवाहन करते हैं कि चातुर्वर्ण्य में विश्वास रखने वाली इस हिन्दू जमात की दरिन्दगी पर उन्हें मुखर होना होगा। संकट की इस घड़ी में खामोश रहना गलत है।

‘चातुर्वर्ण्य मानने वाली यह जमात वास्तव में हिन्दू समाज का एक बहुत ही छोटा हिस्सा है, लेकिन यह जमात अपने को इस तरह पेश करती है कि मानो वही सारे हिन्दू समाज का पर्याय है। इसके खिलाफ ब्राह्मण से लेकर आदिवासी तक, सभी समुदाय के लोगों को एकजुट होने की जरूरत है।

तीसरा अध्याय ‘देखें कठपुतली का खेल’ मुख्यतः संघ के ‘परिवार संगठन भाजपा द्वारा केन्द्र में सत्ता संचालन, उसकी प्राथमिकताएं, शिक्षा के स्वरूप, पाठयक्रमों को बदलने की उसकी कवायद पर, सत्ता में आने के लिए उसके द्वारा किए गए दावे और हक़ीकत के बढ़ते फर्क, सार्वजनिक सम्पत्तियों को निजी हाथों में बेचने की उसकी कोशिशों आदि पर निगाह डालता है (पेज 51) और बताता है कि 'भारत में लोकतंत्र की स्थिति बेहद चिंताजनक हो गई है।’ (पेज 52)

लोकतंत्र की इस त्रासदी की चर्चा करते हुए वह बताते हैं कि इसकी वजह ‘इसका नेतृत्व ऐसी पार्टी कर रही है, जो कि गैर संवैधानिक संघ द्वारा नियंत्रित है, जिसके निर्णय ऐसे लिए जाते हैं जैसे भगवान की मूर्ति से फूल’। (पेज 53).

चौथा अध्याय ‘जाने धर्मांतरण विरोध का सच’ इसी तथ्य से शुरू होता है कि किस तरह भाजपा की सरकारों ने अलग-अलग राज्यों में किस तरह काफी कठोर धर्मातरण विरोधी कानून बनाए हैं या पहले से चले आ रहे कानूनों को और सख्त किया है जो ‘धार्मिक स्वतंत्रता कुचलने की हद तक कड़े हैं और संविधान में दिए गए बुनियादी नागरिक अधिकारों की अवहेलना करते हैं। (पेज 63).

किताब प्रश्न उठाती है कि सरकार आखिर क्या करना चाहती है, जहां नाम धार्मिक स्वतंत्रता का लिया जा रहा है और काम धर्म परिवर्तन पर रोक लगाने का। उसके मुताबिक ‘ऐसा करके एक झटके में संविधान से मिली हुई व्यक्तिगत स्वतंत्रता को पंगु बना दिया गया है। साथ में संविधान प्रदत्त उस अधिकार का भी गला घोंट दिया गया है जिसमें ‘‘अन्तरात्मा के अनुसार किसी भी धर्म का अनुसरण करने, पालन करने, प्रचार करने" की स्वतंत्रता दी गई है। इसके साथ ही, महिलाओं और दलितों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर अपमानित किया गया है।’ (पेज 67).

अध्याय में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्लूएस) के आरक्षण के जरिए भी किस तरह ‘संविधान की हत्या और ‘मनुधर्म’ की स्थापना’ (पेज 68) हो रही है, इसे भी उजागर किया गया है। मालूम हो कि इस आरक्षण के जरिए सवर्णों के आरक्षण का रास्ता खोल दिया गया है, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपनी मुहर लगा दी है।

विडम्बना ही है कि आरक्षण के पीछे के विचार – जिसके तहत सदियों से सामाजिक तौर पर शोषित-उत्पीड़ित तबकों से आने वाले लोगों के लिए विशेष अवसरों का इन्तज़ाम किया गया था, इसमें निहित ‘न्याय की भावना की बलि’ (पेज 68) ईडब्लूएस आरक्षण में दिखती है और आरक्षण का चरित्र भी नष्ट-भ्रष्ट होता दिखता है।

किताब के अन्तिम अध्याय ‘अब चलें साथ-साथ’ में लेखक ‘हमें क्या करना चाहिए’ इसकी विवेचना करते हैं। (पेज 71). लेखक आरएसएस जैसे प्रतिक्रियावादी संगठन के एकताबद्ध रहने, निरन्तर सक्रिय रहने और हमारी सोचने-समझने की शक्ति और विवेकशीलता’ को नष्ट करने में उनकी रणनीति का उल्लेख करते हैं और दूसरी तरफ ‘समाज को भविष्य की तरफ ले जाने वाली विचारधारा (पेज 72) और उसके वाहक संगठनों में आपसी फूट का उल्लेख करते हैं और ऐसे संगठनों के आपस में समन्वय बढ़ाने, विचारों का आदान प्रदान करते रहने में जोर देते हैं (पेज 73)।

उनके मुताबिक ये ताकतें पुराने जमाने की चातुर्वर्ण्य व्यवस्था की हिमायत करती हैै, इसके लिए जरूरी है कि हम अन्य संघर्षों के इतर, आज जो एक विशेष ऐतिहासिक जिम्मेदारी आन पड़ी है, उसे समझें, उसके प्रति सचेत हों। (पेज 72).

अन्त में, वह इस बात की भी भविष्यवाणी करते हैं कि ‘उम्मीद का एक ही आधार है कि बहुसंख्यक समाज, जो आज मूकदर्शक बना हुआ है, अपना क्षोभ प्रकट करे और धर्मान्ध शक्तियों को किसी किस्म का कोई सहयोग न दे। यह न भूलें कि धर्मान्धता अपने ही लोगों की आंखें निकाल कर उन्हें अंधा बना देती है। .. हमें धर्मान्धता के पंजे से अपने बच्चों के दिमाग, उनकी आंखें और उनके दिलों को बचाना है।’ (पेज 76).

प्रश्न उठता है कि क्या भारतीय समाज का प्रबुद्ध तबका लेखक की अपील सुनने को तैयार है? किताब का प्रकाशन और उसे मिली व्यापक प्रतिक्रिया निश्चित ही उम्मीद जगाती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की जन्मशती पूरी होने पर – जबकि उसकी ‘महानता’ के कसीदे पढ़ने में मुख्यधारा के मीडिया में गोया होड़ मची है, इस पृष्ठभूमि में हिन्दी में इसका प्रकाशन एक स्वागतयोग्य घटना है। जाहिर है कि वे सभी लोग, जो भारत के संविधान के सिद्धांतों और मूल्यों को अहमियत जानते हैं, और वे सभी, जो एक ऐसा हिन्दोस्तां बनाने के लिए प्रतिबद्ध है कि एक प्रगति-उन्मुखी, समावेशी, आपसी सदभाव वाले मुल्क का निर्माण हो, उन सभी को चाहिए कि इस इस किताब को, उसके संदेश को दूर दूर तक पहुंचाया जाए।

कन्नड भाषा से परिचित लोग जानते हैं कि किताब के लेखक ‘..ज्यादा बोलते या लिखते नहीं हैं। लेकिन जब भी लिखते या बोलते हैं, तब उनके माध्यम से सच बोलता है।’ (पेज 83) किताब के उत्तरकथन में मशहूर समाजशास्त्री आगे ठीक लिखते हैं कि ‘कन्नडभाषी जन जानते हैं कि ..देवनूर के शब्द बिकाऊ नहीं हैं। ..ईमानदारी उनके जीवन, कर्म और शब्द की पहचान है।’ (पेज 84)

किताब की प्रस्तावना रामचंद्र गुहा ने लिखी है और किताब के अंत में मशहूर साहित्यकार गीताजंलि श्री की टिप्पणी भी रेखांकित की गयी है, जिसमें वह लिखती हैं : 'यह किताब हमारी जिन्दगियों पर आरएसएस के कसते शिकंजे की कड़वी दास्तान है। यह एक फरियाद और एक चेतावनी भी है।.. हमें उनकी सलाह पर गौर करते हुए पूरी तरह सतर्क रहना चाहिए। कम से कम फिलहाल। ऐसा न हो कि उनकी बात वीराने की चीख होकर रह जाए।’

*(समीक्षक स्वतंत्र पत्रकार और दलित चिंतक है।)*

*संदर्भ स्रोत* :

https://indianculturalforum.in/2018/03/22/rss-freedom-struggle/;

https://caravanmagazine.in/cover-story/rss-history-how-hedgewar-spurned-bose-and-his-own-proteges-call-to-join-the-freedom-struggle;

https://thewire.in/politics/the-rsss-struggle-for-legitimacy-rewriting-indias-freedom-narrative

(https://countercurrents.org/2025/05/two-minute-silence-for-amir-pathan/)

Devashish Govind Tokekar
VANDE Bharat live tv news Nagpur
Editor/Reporter/Journalist
RNI:- MPBIL/25/A1465
Indian Council of press,Nagpur
Journalist Cell
All India Media Association
Nagpur District President
Delhi Crime Press
RNI NO : DELHIN/2005/15378
AD.Associate /Reporter
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