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कोई कहता है — शिव की भक्ति से शांति मिली, कोई कहता है राम के नाम से, कोई राधे-राधे या अल्लाह के ज़िक्र से भीतर कुछ अद्भुत अनुभव हुआ। लेकिन शायद

कोई कहता है — शिव की भक्ति से शांति मिली, कोई कहता है राम के नाम से, कोई राधे-राधे या अल्लाह के ज़िक्र से भीतर कुछ अद्भुत अनुभव हुआ।
लेकिन शायद सत्य इससे थोड़ा अलग है।
जीवन की परिपक्वता ही शांति, आनंद और प्रेम का वास्तविक फल है। नाम, रूप और भक्ति केवल माध्यम हो सकते हैं — कारण नहीं। यदि शांति केवल भक्ति से मिलती, तो करोड़ों भक्तों को एक-सी मुक्ति मिल जानी चाहिए थी। पर ऐसा नहीं होता, क्योंकि भीतर जो घटता है वह जीवन के अनुभव, समझ और परिपक्वता से विकसित होता है।
आनंद, प्रेम और समाधि किसी भगवान या गुरु की देन नहीं; यह प्रकृति का स्वभाव है। जैसे वृक्ष अपनी ऋतु और उम्र आने पर स्वयं फूलता-फलता है, वैसे ही मनुष्य भी जीवन को पूर्णता से जीते हुए भीतर खिलता है। कोई बाहरी शक्ति यह काम नहीं करती — यह जीवन का अपना विज्ञान है।
साधना, पूजा, तप या संघर्ष अक्सर तब शुरू होते हैं जब जीवन को सीधे जीना छूट जाता है। वे मन के बनाए रास्ते हैं, जबकि सहजता प्रकृति का नियम है। यदि सत्य पूरी तरह प्राकृतिक है, तो वह सबके लिए समान रूप से उपलब्ध होना चाहिए — बिना जटिल उपायों के।
मुक्ति कोई अलग उपलब्धि नहीं; वह जीवन के साथ जागरूक होकर जीने का स्वाभाविक परिणाम है। जीवन को जियो, उसका बोध लो, उसका रस लो — तब भीतर बिना प्रयास के ही शांति, आनंद और प्रेम के फूल खिलते हैं। यही वास्तविक साधना है।

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