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भटक जाओगे — मैं यह अस्तित्व के नियम से कहता हूँ। जैसे ही तुम किसी धर्म, भगवान, गुरु या दर्शन को पकड़ते हो — भटकाव शुरू हो जाता है। नाम चाहे कोई भी ..

भटक जाओगे — मैं यह अस्तित्व के नियम से कहता हूँ।
जैसे ही तुम किसी धर्म, भगवान, गुरु या दर्शन को पकड़ते हो — भटकाव शुरू हो जाता है।
नाम चाहे कोई भी हो — बुद्ध, ओशो, कबीर, कृष्णमूर्ति, कृष्ण, राम — पकड़ बनी तो भटकाव निश्चित है।
जैसे ही पूजा, मान्यता या सहारा बना, भीतर का फूल खिलना असंभव हो जाता है।
शांति, प्रेम, आनंद या ईश्वर किसी विधि से नहीं आते।
न कोई कारण, न कोई तरीका, न कोई माध्यम।
कभी संयोग से ऐसा लग सकता है कि किसी गुरु या भगवान के दर्शन से भीतर कुछ खिल गया —
लेकिन वह कारण नहीं, केवल संयोग है।
साधना से जो मिलता है वह अस्थायी है।
वह नशा है, आदत है, मन द्वारा बनाया हुआ उपाय है — प्राकृतिक नहीं।
मनुष्य ने अपने भय और दर्द से बचने के लिए उपाय बनाए हैं,
और वही उपाय उसे झूठ में खड़ा रहने के लिए मजबूर करते हैं।
कोई मार्ग नहीं।
कोई गुरु नहीं।
कोई साधना नहीं।
जहाँ नियम और विधि है — वहाँ संसार है।
नियम और विधि जीवन की जरूरतों के लिए उपयोगी हो सकते हैं —
लेकिन शांति और प्रेम के नाम पर वे केवल दर्द की पेनकिलर बन जाते हैं।
जब साधना या गुरु छूटते हैं, तब दुःख अधिक महसूस होता है —
इसलिए लोग उन्हें पकड़कर रखते हैं।
आनंद के कारण नहीं, भय के कारण।
जिस क्षण भीतर से प्रेम, आनंद और शांति की सुगंध उठती है —
धर्म, गुरु, भगवान, शास्त्र सब स्वयं गिर जाते हैं।
कुछ भी पकड़ने योग्य नहीं बचता।
तब जो शेष रहता है —
वह केवल भीतर की मस्ती है।
निर्भरता रहित आनंद।
यही समाधि है।
यही बुद्धत्व है।
यह सभी के साथ नहीं होता —
क्योंकि हर जीवन की परिपक्वता अलग है।
किसी में बचपन में फूल खिल सकता है,
किसी में युवावस्था में,
किसी में कभी नहीं।
यह तब संभव है जब जीवन केवल जिया जा रहा हो —
गहराई से, पूर्णता से, बिना किसी पकड़ के।
जब जीवन की परिपक्वता आती है,
तब धर्म, गुरु, साधना, ज्ञान — सब बाधा बन जाते हैं।
केवल जीवन को जीओ।
पल-पल को रसपूर्ण जीओ।
न स्मरण, न विरोध —
न भगवान को पकड़ना, न उसे नकारना।
केवल जीवन का स्मरण।
तब भीतर का फूल अपने आप खिल सकता है।
यह विश्वास नहीं, श्रद्धा नहीं, कृपा नहीं —
यह अस्तित्व का स्वभाव है।
यह समझ हजारों वर्षों की खोज से प्रकट हुई है।
कई जाग्रत लोगों में ऐसा हुआ है — और आगे भी होगा।
वेदांत 2.0 कोई गुरु नहीं, कोई धर्म नहीं।
यह केवल एक वृक्ष है।
फूल खिले तो उसकी सुगंध लो —
और फिर वेदांत का नाम भी भूल जाओ।
वृक्ष प्रकृति है।
प्रकृति ईश्वर है।
और ईश्वर तुम्हारे भीतर है।
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