जैसी सोच, वैसी राह
लेख:- मानव जीवन एक उच्च स्तर की संरचना है। लेकिन मनुष्य के जीवन में भावनात्मक एवं मानसिक विकार इतना अधिक हावी हो गया है। कि मनुष्य किसी मनुष्य से गुस्सा, ईर्ष्या और नाराजगी का भाव हमेशा अपने मस्तिष्क में रखता है। लेकिन जो भाव मनुष्य अपने अंदर रखता है वही एक मनुष्य का स्वभाव एवं व्यवहार बन जाता है, लेकिन वही मनुष्य अगर प्रेम, उदारता एवं दया, क्षमा का भाव रखें तो मनुष्य का स्वभाव वैसा ही बन जाता है और केवल बनता ही नहीं व्यवहार में दिखता भी है । वही प्रेम और उच्च कोटि के व्यवहार हमें उस परम तत्व परमात्मा को जानने में मदद करती है, क्योंकि परमात्मा का स्वभाव भी उदार एवं दयाशील है, हम मनुष्य उसी परम तत्व से बने हैं। कलयुग में देव और दानव दोनों एक ही शरीर में वास करते हैं, लेकिन मनुष्य ने दानव को पूरी तरह सक्रिय कर लिया है, मनुष्य ने जिस दिन देव को सक्रिय कर लिया उस दिन उन परम तत्व परमात्मा को समझने और जानने से हमें कोई नहीं रोक सकता।
लेखिका: निकिता घनश्याम झा