
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय
*_बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।_*
*_जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।।_*
खैरथल/ हीरालाल भूरानी
शहर के विजय पार्क में आयोजित सत्संग कार्यक्रम में बाबा आयाराम दरबार सरदार नगर अहमदाबाद के गद्दी नशीन संत जीवण राम उर्फ श्याम बाबा ने बताया कि मनुष्य की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि, *वह दूसरों की त्रुटियां खोजने में विशेषज्ञ हो गया है।*
वह दूसरों की बुराइयों का खोजी बन गया है।
वह आलोचक है, समाज-सुधारक है, उपदेशक है—
*और भीतर? भीतर एक गहरी नींद।*
दूसरों को कठघरे में खड़ा करके
तुम स्वयं को न्यायाधीश मान बैठे हो।
*यह सुधार नहीं है, यह अहंकार का सूक्ष्म खेल है।*
किसी की निंदा करना
असल में स्वयं से भागने का सबसे आसान रास्ता है।
उन्होंने कहा कि ध्यान रखना
जिस क्षण तुम किसी की निंदा करते हो,
उस क्षण तुम्हारी स्मृति खो जाती है।
तुम्हारी सुरति गिर जाती है।
*क्योंकि ध्यान बाहर चला गया—*
और जहाँ ध्यान बाहर गया,
वहाँ आत्म-विस्मृति घटित हुई।
___निंदा केवल दूसरे पर आक्रमण नहीं है,
निंदा स्वयं के होने से पलायन है।
*याद रखना,*
जब भी तुम किसी के संबंध में कोई निर्णय लेते हो,
तुम असल में अपने बारे में घोषणा कर रहे होते हो।
वह निर्णय दूसरे के लिए सही हो या न हो,
तुम्हारे लिए वह सौ प्रतिशत सही होता है।
★इसलिए साहब कबीर कहते हैं—
दूसरों के संबंध में न्यायाधीश मत बनो।
*तुम हो कौन?*
दूसरे के भीतर क्या घट रहा है,
*तुम कैसे जानोगे?*
तुम्हें तो अपने भीतर क्या घट रहा है
उसकी भी स्पष्ट खबर नहीं है।
*तुम अपने भीतर उतरे नहीं—*
और दूसरों की जिंदगी में झाँकने चले हो!
गुरु आयाराम कहते हैं—
*_“बुरा न मिलिया कोय।”_*
संसार तुम्हें वही लौटा रहा है
जो तुम अनजाने में उसे दे रहे हो।
*यह जगत एक विराट दर्पण है।*
बाहर वही दिखाई देता है
जो भीतर मौजूद है।
अगर तुम्हें जगत काँटों भरा दिखता है, तो समझ लेना भीतर बगीचा नहीं, मरुस्थल है।
अगर तुम्हें हर चेहरा कुरूप दिखता है, तो जान लेना दर्पण मैला नहीं है, धूल तुम्हारे ही चेहरे पर जमी है। दर्पण निर्दोष है।
*_“जो दिल खोजा आपना…”_*
तो वे आत्म-ग्लानि नहीं सिखा रहे।
वे अपराध-बोध नहीं दे रहे।
यह तो करुणामय आत्म-निरीक्षण है।
शांत, मौन, निष्पक्ष देखने की कला।
*_“मुझसे बुरा न कोय”_*
का अर्थ यह नहीं कि तुम पापी हो।
*इसका अर्थ है—*
जब तुम भीतर झाँकते हो,
तो दिखता है कि जो क्रोध तुम दूसरों पर डाल रहे थे,
वह तुम्हारे भीतर था।
जो ईर्ष्या, जो भय, जो महत्वाकांक्षा
दूसरों पर आरोपित थी—
वह तुम्हारे ही चित्त से उठ रही थी।
सत्संग में उपस्थित सैकड़ों लोगों ने श्याम बाबा के वचनों को सुनकर भावविभोर हो उठे। सत्संग कार्यक्रम के समापन उपरांत उपस्थित श्रद्धालुओं को प्रसादी वितरण किया गया।