
हिंदू एकता के नाम पर सवर्ण मौन, नीति में आरक्षण विस्तार—किसके लिए काम कर रही है सत्ता?
✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा / भोपाल
विशेष रिपोर्ट | राजनीति और समाज
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिनकी सामाजिक पहचान OBC वर्ग से आती है। लेकिन सत्ता में आने के बाद उनकी पहचान ‘हिंदू सम्राट’ के रूप में गढ़ी गई—और इस छवि को बनाने में सामान्य वर्ग ने तन-मन-धन से योगदान दिया। सवाल यह है कि बदले में नीति और फैसलों का संतुलन किस ओर झुका?
2014 के बाद केंद्र सरकार द्वारा लिए गए अनेक बड़े निर्णय स्पष्ट संकेत देते हैं कि राज्य की प्राथमिकताएँ लगातार SC/ST/OBC वर्ग के इर्द-गिर्द केंद्रित रहीं, जबकि सामान्य वर्ग ने लगभग हर मोर्चे पर मौन साधे रखा। सरकार ने OBC आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया, लेकिन सवर्ण आयोग की कभी चर्चा तक नहीं हुई। इसके बाद NEET की ऑल इंडिया कोटा सीटों में 27% OBC आरक्षण लागू किया गया—फिर भी सामान्य वर्ग की ओर से कोई संगठित विरोध नहीं दिखा।
105वां संविधान संशोधन लाकर राज्यों को OBC सूची और आरक्षण तय करने का अधिकार दिया गया। यह एक बड़ा नीतिगत बदलाव था, लेकिन सामान्य वर्ग ने इसे भी “हिंदू एकता” के नाम पर स्वीकार कर लिया। OBC छात्रों के लिए पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप में बढ़ोतरी, मेडिकल, इंजीनियरिंग, IIT-IIM जैसे संस्थानों में सीधा लाभ, और UPSC, SSC, NEET, JEE के लिए फ्री/सब्सिडी कोचिंग योजनाएँ—ये सभी कदम खुले तौर पर एक वर्ग को सशक्त करने की दिशा में रहे। वहीं सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए समकक्ष राष्ट्रीय स्तर की ठोस योजनाएँ नज़र नहीं आईं।
अब UGC के नए नियमों को लेकर सवाल उठ रहे हैं, जिनसे आशंका है कि सामान्य वर्ग के छात्रों पर सीधा प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है—क्या नीति-निर्माण में संतुलन कहीं खो गया है? पिछले एक दशक में आम जनता को लगातार हिंदू-मुस्लिम विमर्श में उलझाए रखा गया। नफरत की राजनीति का शोर तेज़ रहा, तालियाँ और थालियाँ बजती रहीं, “मोदी-मोदी” का जयघोष होता रहा—और इसी बीच नीतिगत स्तर पर सामाजिक संरचना को नए सिरे से वर्गों में बाँट दिया गया।
यह विडंबना ही है कि जिस देश में खुद को सेक्युलर कहकर गर्व किया जाता है, वहीं आज जाति के भीतर जाति गढ़ी जा रही है। सेक्युलरिज़्म का नारा ज़ुबान पर है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई उससे कोसों दूर।
प्रधानमंत्री अपने 18 घंटे काम करने की बात बार-बार कहते हैं और समर्थक इसे उपलब्धि की तरह दोहराते हैं। सवाल काम के घंटों का नहीं, काम की दिशा और असर का है—क्योंकि अगर विकास असंतुलित हो, तो वह दीमक की तरह धीरे-धीरे पूरे ढाँचे को खोखला कर देता है।
आज जब सामान्य वर्ग से बार-बार यह पूछा जा रहा है कि उसने हिंदू एकता के लिए क्या किया, तो शायद अब समय है कि सवाल पूछने वालों से भी कहा जाए—दूसरों पर उंगली उठाने से पहले, अपने गिरेबान में झाँकिए।