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मरा हुआ समझा गया बेटा लौटेगा ज़िंदा—पाकिस्तान की जेल से रिहा होकर घर आएगा प्रसन्नजीत

सात साल तक बहन ने लड़ी जंग, राखी की डोर बनी उम्मीद—अब अमृतसर से वतन वापसी की तैयारी
बालाघाट।
जिस बेटे को परिवार ने वर्षों पहले मरा हुआ मान लिया था, वही आज ज़िंदा होकर घर लौटने वाला है। पाकिस्तान की जेल में सात साल तक बंद रहने के बाद बालाघाट जिले के खैरलांजी निवासी प्रसन्नजीत रंगारी की रिहाई की खबर ने पूरे परिवार की किस्मत का पन्ना पलट दिया है। वर्षों के इंतज़ार, संघर्ष और आंसुओं के बाद बहन संघमित्रा को वह खबर मिली, जिसका सपना उसने हर दिन देखा—भाई अब घर आएगा।
दरअसल, 31 जनवरी को पाकिस्तान द्वारा रिहा किए गए 7 भारतीय नागरिकों की सूची में प्रसन्नजीत रंगारी का नाम शामिल है। पाकिस्तान की जेल में वह “सुनील अदे” के नाम से बंद था। वर्षों तक पहचान छिपी रही, लेकिन सच ने आखिरकार रास्ता बना ही लिया।
पहले मरा माना, फिर ज़िंदा होने की खबर—किस्मत ने बदली करवट
प्रसन्नजीत वर्ष 2017–18 में घर से लापता हुआ था। पहले बिहार गया, फिर कुछ समय बाद घर लौटा, लेकिन इसके बाद अचानक फिर गायब हो गया। परिजनों ने हर संभव जगह तलाश की, लेकिन जब कोई सुराग नहीं मिला तो मजबूरी में उसे मरा हुआ मान लिया गया।
समय बीतता गया, पिता लोपचंद रंगारी बेटे के इंतज़ार में दुनिया छोड़ गए। घर में सन्नाटा और मां की आंखों में चिंता स्थायी हो गई।
लेकिन दिसंबर 2021 में एक फोन कॉल ने सब कुछ बदल दिया। उस कॉल से पता चला कि प्रसन्नजीत पाकिस्तान की जेल में बंद है। जानकारी सामने आई कि 1 अक्टूबर 2019 को उसे पाकिस्तान के बाटापुर इलाके से हिरासत में लिया गया था।
बहन का संघर्ष: सात साल, हर दरवाज़े पर दस्तक
भाई की खबर मिलते ही बहन संघमित्रा ने हार नहीं मानी। प्रशासन, पुलिस, जनप्रतिनिधि—जहां भी उम्मीद दिखी, वहां आवाज़ उठाई।
बीते रक्षाबंधन पर बहन द्वारा पाकिस्तान जेल में बंद भाई के लिए राखी भेजे जाने की मार्मिक खबर ने पूरे देश का ध्यान खींचा था। वही राखी आज उम्मीद की सबसे मज़बूत कड़ी बन गई।
1 फरवरी की सुबह आई खुशखबरी
1 फरवरी को दोपहर करीब 1 बजे फोन की घंटी बजी—खैरलांजी पुलिस स्टेशन से खबर आई कि प्रसन्नजीत रिहा हो चुका है। इसके बाद अमृतसर थाने से फोन आया और वर्षों बाद बहन ने भाई की आवाज़ सुनी।
उस पल घर में खुशी भी थी और गम भी—खुशी भाई के ज़िंदा लौटने की, और गम इस बात का कि पिता यह दिन नहीं देख सके।
अमृतसर जाएगा परिवार, प्रशासन से मदद की उम्मीद
प्रसन्नजीत इस समय अटारी–वाघा बॉर्डर पर कस्टम व इमिग्रेशन प्रक्रिया पूरी करने के बाद रेड क्रॉस भवन, मजीठा रोड और गुरु नानक देव हॉस्पिटल, अमृतसर में है।
भाई को घर लाने के लिए जीजा राजेश अमृतसर जाने की तैयारी में हैं, लेकिन परिवार आर्थिक रूप से कमजोर है और लंबी यात्रा अकेले करना भी उनके लिए कठिन है। ऐसे में प्रशासन से सहयोग की आवश्यकता है। प्रशासन ने सहायता का भरोसा जरूर दिलाया है।
पढ़ाई में तेज, लेकिन बीमारी ने तोड़ दिया सपना
खैरलांजी निवासी प्रसन्नजीत रंगारी पढ़ाई में बेहद होनहार था। पिता लोपचंद रंगारी ने कर्ज लेकर उसे जबलपुर के गुरु रामदास खालसा इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से बी. फार्मेसी की पढ़ाई करवाई।
साल 2011 में उसने एमपी स्टेट फार्मेसी काउंसिल में पंजीकरण भी कराया। आगे पढ़ने का सपना था, लेकिन मानसिक स्थिति खराब होने के कारण उसे पढ़ाई छोड़कर घर लौटना पड़ा। वही बीमारी उसके जीवन की सबसे बड़ी चुनौती बन गई।
मां की आंखों में खुशी भी, चिंता भी
आज मां के चेहरे पर बेटे के लौटने की खुशी है, लेकिन उसकी बीमारी की चिंता भी उतनी ही गहरी है। बहन और मां की आंखों में आंसू हैं—कुछ खुशी के, कुछ बीते संघर्ष की यादों के।
सवाल जो उठते हैं (न्यूज़ पेपर एंगल)
आखिर मानसिक रूप से अस्वस्थ युवक कैसे सीमा पार पहुंचा?
सात साल तक पहचान छिपी कैसे रही?
ऐसे मामलों में केंद्र व राज्य सरकार की क्या जिम्मेदारी बनती है?
क्या परिवार को आर्थिक व चिकित्सकीय सहायता मिलेगी?
निष्कर्ष
यह सिर्फ एक व्यक्ति की रिहाई नहीं, बल्कि एक बहन की सात साल की जीत, एक परिवार की टूटी उम्मीदों का जुड़ना और इंसानियत की वापसी की कहानी है। अब पूरा बालाघाट, खैरलांजी और प्रदेश यही दुआ कर रहा है कि प्रसन्नजीत सुरक्षित घर लौटे और उसे बेहतर इलाज व नया जीवन मिले।

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