
सत्ता की बिसात पर मोहरा बनती जनता: गिरगिटिया राजनीति और दरकता सामाजिक ताना-बना
विशेष विश्लेषण: क्या हम लोकतंत्र से 'भावुकतंत्र' की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ मुद्दे गौण और नरेटिव प्रधान हो गए हैं?
✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा / भोपाल
भोपाल: आज का दौर रिश्तों में मिलावट का नहीं, बल्कि रिश्तों के 'राजनीतिकरण' का है। जिस तरह राजनीति हर सुबह एक नया चोला ओढ़कर सामने आती है, ठीक उसी तरह समाज के आपसी संबंधों पर भी सत्ता की महत्वाकांक्षा का रंग चढ़ने लगा है। गिरगिट तो केवल प्रकृति के अनुरूप रंग बदलता है, लेकिन आधुनिक राजनीति के महारथी जिस तेजी से अपने वादों और बयानों से पलटते हैं, उसने 'बदलाव' की परिभाषा ही बदल दी है।
वादों का 'एक्टिंग' काल और महंगाई का सन्नाटा: 2014 से पहले जिन मुद्दों पर सड़कों पर आंसू बहाए जाते थे, आज उन पर गहरा सन्नाटा पसरा है। रुपया गिर रहा है, रसोई गैस की आग चूल्हों से ज्यादा बजट को जला रही है और टोल टैक्स की लंबी कतारें आम आदमी की जेब खाली कर रही हैं। विडंबना देखिए कि जो कल 'काले धन' के खिलाफ हुंकार भरते थे, आज उनके दौर में विदेशों में धन छुपाने वालों के लिए कानूनों की नरमी चर्चा का विषय बनी हुई है। 'ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा' का नारा अब 'खाओ और खिलाओ' के शोर में कहीं खो गया है।
पिंजरे के पंछी और जांच एजेंसियां: आज जनता के मन में यह सवाल गहरे पैठ गया है कि क्या जांच एजेंसियां और न्यायपालिका स्वतंत्र हैं या वे केवल सत्ता के हाथ की कठपुतलियां बनकर रह गई हैं? विपक्ष में रहने पर जो भ्रष्ट थे, सत्ता की 'वाशिंग मशीन' में धुलते ही वे पवित्र कैसे हो जाते हैं? ED और CBI की सक्रियता अब भ्रष्टाचार मिटाने के लिए कम और राजनीतिक समीकरण बिठाने के लिए ज्यादा दिखने लगी है।
जाति का 'नया अवतार' और सामाजिक बंटवारा : समाज को जोड़ने के बजाय, राजनीति अब उसे सूक्ष्म स्तर पर बांटने में जुटी है। कभी हिंदू-मुस्लिम तो कभी सवर्ण-दलित के खेल में असली मुद्दे पीछे छूट गए हैं। सबसे बड़ा आश्चर्य तो यह है कि जो धर्म जाति व्यवस्था को नहीं मानते थे, वहां भी अब SC/ST और OBC की श्रेणियां बनाई जा रही हैं।
• मध्यप्रदेश का उदाहरण: हाल ही में मुस्लिम समाज की दर्जनों जातियों को आरक्षण की श्रेणी में लाना यह दर्शाता है कि राजनीतिज्ञों की 'बांटो और राज करो' की नीति अंग्रेजों से भी कहीं आगे निकल चुकी है।
• दस्तावेजी अमीर बनाम असली गरीब: आज देश में योग्यता (Skill) की कीमत नहीं, बल्कि जाति प्रमाण पत्र की कीमत है। राष्ट्रपति या बड़े पदों पर पहुंचने के बाद भी लोग 'पिछड़ा' बने रहना चाहते हैं ताकि लाभ सुरक्षित रहे, जबकि असली जरूरतमंद कागजों पर 'करोड़पति' बनकर सिस्टम की मार झेल रहा है।
घोषणाओं की PHD और जनता का ताली-थाली मोह : सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग घोषणाएं करने में 'PHD' कर चुके हैं। मंचों से खुद ही अपनी पीठ थपथपाना और जनता से तालियां बजवाना एक नया ट्रेंड बन गया है। कानून बनते हैं, समाज लड़ता है, फिर स्टे (Stay) आता है और अंत में नेताजी श्रेय लेकर निकल जाते हैं। जनता आज भी ताली और थाली बजाने के उसी सम्मोहन में है, जिससे उसे बाहर निकलने की जरूरत है।
निष्कर्ष: अब कृष्ण की चेतावनी को समझने का समय है : महाभारत के मैदान में कृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि सामने कोई भी हो, अगर वह अधर्म के साथ खड़ा है तो प्रहार अनिवार्य है। आज की 'स्वार्थी राजनीति' ने आम जनता को उसी दोराहे पर खड़ा कर दिया है। अगर जनता अपनी आंखों से पट्टी हटाकर सवाल नहीं पूछेगी और विद्रोह (वैचारिक) नहीं करेगी, तो कुर्सी की लालच में ये नेता देश के सामाजिक ताने-बाने को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर देंगे।
वक्त आ गया है कि हम 'मूर्ख जनता' की श्रेणी से बाहर निकलकर 'जागरूक नागरिक' बनें, वरना इतिहास गवाह है कि जो समाज सो जाता है, राजनीति उसे बेच खाती है।