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शब्दों में सियासत, संकेतों में सत्ता


राजनीति में कई बार सबसे बड़ा बयान वही होता है, जो सीधे नहीं कहा जाता। वरिष्ठ पवार की हालिया मुलाकात इसी श्रेणी में आती है। यह न भावनात्मक प्रतिक्रिया थी और न ही सफाई। यह एक सोचा-समझा राजनीतिक हस्तक्षेप था, जिसने मौजूदा घटनाक्रम को नई दिशा दे दी।
“मुझे शपथविधि की जानकारी नहीं थी” यह वाक्य पहली नज़र में साधारण लग सकता है, लेकिन इसके निहितार्थ गहरे हैं। इस एक पंक्ति ने वरिष्ठ पवार को पूरे फैसले से अलग खड़ा कर दिया और साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि सत्ता के मौजूदा फैसले किन हाथों में लिए जा रहे हैं। राजनीति में खुद को अलग दिखाना कई बार विरोध जताने का सबसे असरदार तरीका होता है।
नाम लिए बिना प्रफुल्ल पटेल और तटकरे गुट की भूमिका पर इशारा करना भी इसी रणनीति का हिस्सा था। सीधे आरोप से बचते हुए, संकेतों में सूत्रधारों को जनता के सामने लाया गया। इससे संदेश भी चला गया और टकराव की गुंजाइश भी सीमित रही।
“इतनी जल्दबाज़ी क्यों?” यह सवाल असल में मौजूदा नेतृत्व पर अविश्वास का बयान है। यह बताने की कोशिश कि फैसले दबाव में और डर के माहौल में लिए जा रहे हैं। भाजपा के साथ संभावित समीकरण और विलय को लेकर जो बेचैनी है, उसे इस सवाल ने उजागर कर दिया।
12 तारीख का संदर्भ केवल तारीख नहीं था, बल्कि एक भावनात्मक और वैचारिक रेखा थी। यह याद दिलाया गया कि दादा की राजनीतिक विरासत किसके पास है और किसके पास नहीं। यह संदेश सीधे उन कार्यकर्ताओं तक गया, जिनके लिए दादा केवल नेता नहीं, बल्कि विचार हैं।
पवार परिवार के मुद्दे पर साफ रुख अपनाकर वरिष्ठ पवार ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यह लड़ाई पारिवारिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक है। इससे सहानुभूति बनाम सिद्धांत की बहस में सिद्धांत को केंद्र में लाया गया।
बारामती में नीरा नदी क्षेत्र की मौजूदगी को भी हल्के में नहीं लिया जा सकता। यह प्रशासनिक दौरा कम और राजनीतिक संकेत ज्यादा था। सत्ता के केंद्र को यह याद दिलाने के लिए कि जमीनी पकड़ और प्रभाव अब भी कायम है।
कुल मिलाकर, यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि वरिष्ठ पवार अभी भी राजनीति के खेल में दर्शक नहीं हैं। वे मैदान में हैं, अपने तरीके से। कम शब्दों में, बिना शोर के, लेकिन असरदार ढंग से।
यही उनकी राजनीति की असली पहचान रही है।

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