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शतावरी एक अचूक चिकित्सा उपाय अनेक

चंडीगढ़ 01/02/2026 आरके विक्रमा शर्मा अनिल शारदा प्रस्तुति ----- भारतीय आयुर्वेद सनातन की बहुत बड़ी उपलब्धि है। सनातन ही इसका जनक है। इसमें जीवन संबंधी शारीरिक और मानसिक बौद्धिक स्तर पर होने वाली हानियों को सुधार कर स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करने की अनेकों अनेक विधाएं विद्यमान है।

इस पौधे का उपयोग सहस्राब्दियों से चिकित्सीय प्रयोजनों के लिए किया जाता रहा है, मुख्य रूप से महिला प्रजनन अंगों पर इसके उपचारात्मक प्रभाव के लिए।

आयुर्वेद में ए. रेसमोसस को एक शक्तिशाली रसायन के रूप में वर्णित किया गया है जो उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करता है, दीर्घायु बढ़ाता है, प्रतिरक्षा और मानसिक प्रदर्शन को बढ़ाता है।

आयुर्वेद में जड़ों का उपयोग पेट, कामोत्तेजक, टॉनिक और आंत्र कसैले के रूप में किया जाता है। पेचिश, ट्यूमर, पित्त, रक्त और नेत्र विकार, सूजन, गठिया और तंत्रिका तंत्र विकार सभी का इलाज इनसे किया जाता है।

इसकी जड़ों का उपयोग यूनानी चिकित्सा में लीवर और किडनी की समस्याओं, ग्लीट और गोनोरिया को ठीक करने के लिए किया जाता है।

भारत के आयुर्वेदिक फार्माकोपिया के अनुसार, कंदीय जड़ों का उपयोग गठिया, लैक्टिक समस्याओं, प्रसव संबंधी बीमारियों, हेमट्यूरिया और अन्य चिकित्सीय अनुप्रयोगों में किया जाता है। इसका उपयोग सामान्य टॉनिक और महिला प्रजनन टॉनिक के रूप में किया जाता है।

इस पौधे की जड़ का अर्क आयुर्वेदिक फॉर्मूलेशन 'सतावरी मंडूर' में प्रमुख तत्व है, जिसका उपयोग पारंपरिक रूप

से गैस्ट्रिक अल्सर को ठीक करने के लिए किया जाता है।'

शतावरी, हिमालय बेल्ट का एक मूल पौधा है, जिसे आयुर्वेद (चरक संहिता) में गैलेक्टागॉग के रूप में नियोजित 3

किया गया है, और नैदानिक जांच से बांझपन को ठीक करने की इसकी क्षमता का पता चला है।

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