
बजट का इतिहास और ‘हलवा रस्म’ की परंपरा
लेख
बजट शब्द सुनते ही हमारे मन में अनेक प्रश्न उठते हैं—
सरकार हर वर्ष बजट क्यों बनाती है?
यह आम जनता को कैसे प्रभावित करता है?
और बजट पेश करने से पहले होने वाली ‘हलवा रस्म’ आखिर क्या होती है?
इन्हीं सभी सवालों के उत्तर इस लेख के माध्यम से आमजन तक पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा है।
जिस प्रकार किसी परिवार की आर्थिक व्यवस्था उसके संतुलित घरेलू बजट पर निर्भर करती है, उसी प्रकार किसी देश की प्रगति और स्थिरता सरकार के बजट पर आधारित होती है। बजट के माध्यम से सरकार अपने पूरे वर्ष की आय और व्यय का विवरण प्रस्तुत करती है तथा यह बताती है कि वह आगामी वर्ष में किन योजनाओं और विकास कार्यों पर खर्च करने वाली है।
बजट शब्द की उत्पत्ति
‘बजट’ शब्द लैटिन भाषा के शब्द Bougette से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है — चमड़े का थैला। पहले समय में वित्त मंत्री अपने भाषण के दस्तावेज चमड़े के थैले में रखकर लाते थे, जिससे ‘बजट’ शब्द प्रचलन में आया।
भारत में बजट का इतिहास
भारत में पहला बजट 18 फरवरी 1860 को प्रस्तुत किया गया था। इसे ब्रिटिश शासनकाल में वित्त सदस्य जेम्स विल्सन ने पेश किया था। उस समय वित्तीय वर्ष 1 मई से 30 अप्रैल तक माना जाता था।
स्वतंत्र भारत का पहला बजट 26 नवंबर 1947 को तत्कालीन वित्त मंत्री आर. के. षण्मुखम चेट्टी ने पेश किया।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 112 में केंद्रीय बजट का उल्लेख है, जिसे वार्षिक वित्तीय विवरण कहा गया है। यह भारत सरकार का वार्षिक आर्थिक लेखा-जोखा होता है।
रिकॉर्डधारी वित्त मंत्री
मोरारजी देसाई ऐसे एकमात्र वित्त मंत्री रहे हैं जिन्होंने 10 बार बजट प्रस्तुत किया। विशेष बात यह है कि उन्होंने वर्ष 1964 और 1968 में अपना जन्मदिन बजट पेश करते हुए मनाया। यह उपलब्धि आज तक कोई अन्य वित्त मंत्री हासिल नहीं कर सका।
बजट पेश करने की परंपरा में बदलाव
सन् 2000 तक अंग्रेजी परंपरा के अनुसार बजट शाम 5 बजे संसद में पेश किया जाता था।
लेकिन वर्ष 2001 में एनडीए सरकार ने यह परंपरा बदली और वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने सुबह 11 बजे बजट प्रस्तुत किया। यह परंपरा आज भी जारी है।
बजट निर्माण की गोपनीयता
जिस दिन से बजट निर्माण की प्रक्रिया शुरू होती है, उस दिन से वित्त मंत्रालय से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी नॉर्थ ब्लॉक में ही रहते हैं। लगभग 7 दिनों तक वे बाहरी दुनिया से पूरी तरह कटे रहते हैं।
वे न तो मोबाइल फोन का प्रयोग करते हैं और न ही परिवार से संपर्क कर सकते हैं। इसका उद्देश्य यह होता है कि बजट से जुड़ी कोई भी जानकारी समय से पहले सार्वजनिक न हो सके।
क्या होती है ‘हलवा रस्म’?
बजट से जुड़ी सबसे रोचक परंपरा है — हलवा रस्म।
जब बजट दस्तावेजों की छपाई शुरू होने वाली होती है, उससे पहले वित्त मंत्रालय में हलवा बनाया जाता है और वित्त मंत्री द्वारा अधिकारियों को परोसा जाता है। इसी के साथ बजट की छपाई की प्रक्रिया औपचारिक रूप से शुरू मानी जाती है।
मेरे मतानुसार, जैसे किसी शुभ कार्य से पहले मुँह मीठा किया जाता है, उसी प्रकार बजट जैसे महत्वपूर्ण कार्य से पहले हलवा खाया जाता है ताकि आने वाला वर्ष शुभ और सफल हो।
भारतीय परंपरा में हलवा को शुभ पकवान माना जाता है, इसलिए इसे इस अवसर से जोड़ा गया है।
चुनावी वर्ष में दो बजट
जिस वर्ष लोकसभा चुनाव होते हैं, उस वर्ष आमतौर पर दो बजट पेश किए जाते हैं—
पहला अंतरिम बजट, और दूसरा नई सरकार बनने के बाद पूर्ण बजट।
अंतरिम बजट में बड़ी नीतिगत घोषणाएँ नहीं की जातीं, बल्कि खर्च चलाने की व्यवस्था की जाती है।
बजट केवल आँकड़ों का दस्तावेज नहीं होता, बल्कि यह देश की आर्थिक दिशा तय करता है।
इसमें किसानों, युवाओं, महिलाओं, व्यापारियों, कर्मचारियों और गरीब वर्ग के लिए योजनाएँ बनाई जाती हैं।
यही कारण है कि बजट को लोकतंत्र का आर्थिक आधार कहा जाता है।
‘हलवा रस्म’ जैसी परंपराएँ हमें यह बताती हैं कि आधुनिक शासन व्यवस्था भी भारतीय संस्कृति से जुड़ी हुई है।