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यूजीसी के नियमों के खिलाफ उत्तर प्रदेश में जनआवाज़ तेज़, नेता नहीं बल्कि समाज के सिपाही बनकर खड़े हैं कान्हा राणा

लखनऊ/सहारनपुर।
उत्तर प्रदेश में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों को लेकर समाज के हर वर्ग में गहरा असंतोष दिखाई दे रहा है। इन नियमों को शिक्षा विरोधी और दमनकारी बताते हुए प्रदेशभर में विरोध की आवाज़ उठ रही है। इसी क्रम में सहारनपुर से सामने आए कान्हा राणा किसी राजनीतिक नेता के रूप में नहीं, बल्कि समाज के एक सच्चे सिपाही के रूप में यूजीसी के नियमों के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे हैं।

कान्हा राणा का कहना है कि यह लड़ाई सत्ता या राजनीति की नहीं, बल्कि समाज और छात्रों के अधिकारों की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे किसी पद या राजनीति के लिए नहीं, बल्कि शिक्षा और सामाजिक न्याय की रक्षा के लिए मैदान में हैं। यही कारण है कि उनके साथ ब्राह्मण, वैश्य, कायस्थ समाज के साथ-साथ ओबीसी और अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग के लोग भी एकजुट होकर खड़े हैं। यह आंदोलन एकता और सामाजिक समरसता की मिसाल बनता जा रहा है।

विरोध कर रहे लोगों का आरोप है कि यूजीसी के नए नियमों से शिक्षण संस्थानों में भय का वातावरण बन रहा है और छात्रों को बिना किसी सुरक्षा के जटिल प्रक्रियाओं में झोंका जा रहा है। आंदोलनकारियों ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य भय नहीं, बल्कि ज्ञान और समान अवसर होना चाहिए।

प्रदेश के अलग-अलग जिलों में समाज के लोगों ने सरकार से मांग की कि यूजीसी के इन नियमों को वापस लिया जाए और छात्र हितों के अनुरूप नए नियम बनाए जाएं। कान्हा राणा ने समाज से अपील की कि शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से इस संघर्ष को आगे बढ़ाया जाए।

उत्तर प्रदेश में उठी यह आवाज अब केवल विरोध नहीं, बल्कि छात्रों और समाज के अधिकारों की लड़ाई बनती जा रही है, जिसमें कान्हा राणा एक नेता के रूप में नहीं, बल्कि समाज के सिपाही के रूप में अग्रिम पंक्ति में खड़े नजर आ रहे हैं।

लेख: ऋषभ पराशर, राष्ट्रीय अध्यक्ष, AIMA मीडिया युवा प्रकोष्ठ

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