यूजीसी के नए नियमों पर अधिवक्ताओं का कड़ा प्रहार, कहा—“सामाजिक न्याय की आड़ में सामान्य वर्ग के साथ संवैधानिक अन्याय” _
जिला मुख्यालय औरैया _
अतेंद्र पाण्डेय "विमल"के प्रतिनिधित्व में अधिवक्ताओं के समूह ने जिलाधिकारी औरैया सौंपा ज्ञापन
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों के खिलाफ जिला बार एसोसिएशन और सवर्ण मोर्चा ने मोर्चा खोलते हुए तीखा विरोध दर्ज कराया। अधिवक्ताओं ने जिलाधिकारी को सौंपे गए विस्तृत ज्ञापन में यूजीसी की नीतियों को संविधान की मूल भावना, विधि शिक्षा, उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और न्यायिक भविष्य के लिए घातक बताया।
अधिवक्ताओं ने दो टूक कहा कि नेट (NET), जेआरएफ (JRF) और फेलोशिप वितरण की मौजूदा व्यवस्था ने सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए असमान और अन्यायपूर्ण प्रतिस्पर्धा का माहौल बना दिया है। कट-ऑफ, सीट आवंटन और फेलोशिप नीति ऐसी बना दी गई है कि सामान्य वर्ग के योग्य छात्र अवसरों से बाहर होते जा रहे हैं, जबकि योग्यता पीछे धकेली जा रही है।
फैकल्टी भर्ती और प्रोन्नति पर भी तीखा हमला करते हुए अधिवक्ताओं ने कहा कि विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में अब योग्यता, अनुभव और अकादमिक उत्कृष्टता नहीं, बल्कि वर्ग-आधारित प्राथमिकता निर्णायक बन चुकी है। इसका सीधा परिणाम उच्च शिक्षा की गिरती गुणवत्ता और न्यायिक-शैक्षणिक व्यवस्था के कमजोर भविष्य के रूप में सामने आ रहा है।
ज्ञापन में ईडब्ल्यूएस व्यवस्था को दिखावा मात्र बताया गया। अधिवक्ताओं का आरोप है कि सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए बनाई गई ईडब्ल्यूएस व्यवस्था या तो सही ढंग से लागू नहीं हो रही है या केवल कागजी औपचारिकता बनकर रह गई है, जिससे वास्तविक जरूरतमंद छात्र उपेक्षित हो रहे हैं।
आरक्षण की सीमा और उसके स्थायीकरण पर भी गंभीर सवाल उठाए गए। अधिवक्ताओं ने स्पष्ट कहा कि आरक्षण को अस्थायी और संतुलित उपाय के बजाय स्थायी व्यवस्था में बदल दिया गया है, जबकि सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं के आधार पर समय-समय पर इसकी समीक्षा संविधान की अनिवार्य मांग है।
ज्ञापन में यह भी कहा गया कि मौजूदा नीतियों का मानसिक, सामाजिक और अकादमिक दबाव सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों पर घातक प्रभाव डाल रहा है। अधिवक्ताओं ने साफ किया कि यह विरोध किसी वर्ग या समुदाय के खिलाफ नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था के खिलाफ है जो सामाजिक न्याय के नाम पर एक वर्ग के साथ स्थायी अन्याय को वैध बना रही है।
अधिवक्ताओं ने चेतावनी दी कि यदि यूजीसी के इन नियमों पर शीघ्र पुनर्विचार नहीं किया गया, तो यह केवल शिक्षा व्यवस्था ही नहीं बल्कि संवैधानिक संतुलन और न्यायिक भविष्य पर भी गंभीर संकट खड़ा करेगा।