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“मन की शांति—जीवन की शक्ति, अशांति—जीवन की दुर्बलता” डॉ. चंद्रकांत सोनवानी के आध्यात्मिक विचारों ने दिया सार्थक जीवन का मार्ग

आज का मनुष्य भले ही भौतिक साधनों और आधुनिक सुविधाओं से सम्पन्न हो गया हो, लेकिन भीतर की अशांति ने उसे मानसिक रूप से कमजोर कर दिया है। आधुनिक जीवन की आपाधापी, प्रतिस्पर्धा और अपेक्षाओं के बीच मानसिक संतुलन बनाए रखना बड़ी चुनौती बन चुकी है। ऐसे समय में शिक्षक एवं आध्यात्मिक चिंतक डॉ. चंद्रकांत सोनवानी का विचारप्रधान लेख “मन की शांति—एक शक्ति, अशांति—एक दुर्बलता” जीवन को नई दिशा देने वाला गहन संदेश प्रस्तुत करता है।
अपने लेख में डॉ. सोनवानी स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य की वास्तविक पहचान उसका शरीर या पद नहीं, बल्कि उसका मन और चेतना है। शास्त्रों का उल्लेख करते हुए वे कहते हैं— “मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः”, अर्थात मन ही बंधन का कारण है और मन ही मुक्ति का मार्ग।
शांत मन व्यक्ति को उसके वास्तविक स्वरूप से जोड़ता है, जबकि अशांत मन भ्रम, दुख और दुर्बलता का जनक बनता है।
डॉ. सोनवानी ने मन की शांति को आध्यात्मिक शक्ति का मूल स्रोत बताया है। उनके अनुसार शांत मन वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित हुए बिना भीतर स्थिर रहता है। ऐसा मन अहंकार, क्रोध, लोभ और वासनाओं से ऊपर उठने की दिशा में अग्रसर होता है। इसके विपरीत अशांत मन व्यक्ति को ईश्वर और आत्मा के साक्षात्कार से दूर कर देता है।
वे लिखते हैं कि मन की अशांति का मुख्य कारण अनियंत्रित इच्छाएँ, अहंकार, तुलना और ईर्ष्या हैं। “मैं” और “मेरा” की भावना जब तीव्र हो जाती है, तब मन अस्थिर होकर दुख का कारण बनता है। आध्यात्मिक जीवन व्यक्ति को वर्तमान क्षण में जीना सिखाता है, जिससे पछतावा और चिंता दोनों कम होने लगते हैं।
मन की शांति के उपाय बताते हुए डॉ. सोनवानी ने ध्यान, जप, प्रार्थना और स्वाध्याय को अत्यंत प्रभावी साधन माना है। ध्यान मन को विचारों की भीड़ से पार ले जाता है, प्रार्थना मन को विनम्र बनाती है, तथा स्वाध्याय व्यक्ति को आत्मबोध की ओर ले जाता है। इसके साथ ही संतोष और वैराग्य को भी मन की स्थिरता का आधार बताया गया है।
उनका मानना है कि जब व्यक्ति यह समझ लेता है कि संसार अस्थायी है और आत्मा शाश्वत, तब उसकी मानसिक उथल-पुथल स्वतः समाप्त होने लगती है।
डॉ. सोनवानी यह भी कहते हैं कि शांत मन केवल स्वयं को ही नहीं, बल्कि समाज को भी प्रकाश देता है। शांत व्यक्ति स्वभावतः करुणामय, प्रेमपूर्ण और सेवा भाव से युक्त हो जाता है। यही सच्ची आध्यात्मिकता है—स्वयं शांत होना और दूसरों में भी शांति का प्रकाश फैलाना।
लेख के अंत में वे लिखते हैं कि मन की शांति आत्मिक जागरण की शक्ति है, जबकि अशांति अज्ञान की दुर्बलता है। जब तक मन अशांत है, जीवन संघर्ष जैसा प्रतीत होता है; और जब मन शांत हो जाता है, वही जीवन आनंद और साधना का मार्ग बन जाता है।
आज के तनावग्रस्त समाज में डॉ. सोनवानी का यह विचारात्मक लेख न केवल आध्यात्मिक चेतना जगाता है, बल्कि मानसिक संतुलन और सार्थक जीवन की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा भी देता है।

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