logo

दुःख, दुःख नहीं; सुख, सुख नहीं— दोनों के भीतर जीवन बह रहा है। वही जीवन ईश्वर है। वेदान्त 2.0 Life

वेदांता 2.0 — कारणों से परे जीवन ✧
हर कोई कहता है—
यह कारण है तुम्हारे दुःख का।
कारण हज़ार हैं।
धर्म, राजनीति, विज्ञान, शिक्षा, मोटिवेशन, गुरु—
जहाँ जाओ, कोई न कोई कारण थमा देगा।
साथ में उपाय, आश्वासन, आशीर्वाद भी।
पर एक सच है—
जो कारण देता है, वह स्वयं दुःखी है।
जो उपाय बेचता है, वह भी भटका हुआ है।
और तुम भी, उसी भटकाव में उसके पीछे।
सुखी व्यक्ति तुम्हें कोई मार्ग नहीं देगा।
वह साधना नहीं सिखाएगा, न नुस्ख़ा।
वह केवल प्रकृति के नियमों की ओर संकेत करेगा।
क्योंकि दुःख किसी बाहरी कारण से नहीं—
दुःख हमारी इच्छा का परिणाम है,
तुलना और प्रतिस्पर्धा का परिणाम है,
और सबसे गहरा कारण—“मैं हूँ” का आग्रह।
हमारी बुद्धिमत्ता ही हमारा बोझ बन जाती है।
सुख की खोज ही दुःख का बीज है।
सबसे बड़ा अभाव यह है कि
हमें जीना नहीं सिखाया गया।
न यह बताया गया कि जीवन का लक्ष्य क्या है।
न यह कि तुम कौन हो, क्यों हो, और कहाँ जा रहे हो।
सब दौड़ रहे हैं—पर समाधान कहीं नहीं।
जो सुख आज दिए जाते हैं,
वे पेनकिलर हैं—
क्षणिक उत्तेजना, थोड़ी देर की राहत।
फिर वही पुराना दुःख।
हाँ, जीवन में दुःख आता है—
पर वह सहज है, अनिवार्य है।
उसी से भागना नए-नए दुःखों को जन्म देता है।
संसार सुख और दुःख दोनों है—
पर उनसे परे एक अवस्था है: आनंद।
आनंद में सुख-दुःख गौण हो जाते हैं।
आनंद लक्ष्य हो,
तो दुःख में भी वही मिलता है,
सुख में भी वही।
सुख और दुःख विरोधी नहीं—
दोनों एक ही जीवन के भीतर हैं।
दुःख, दुःख नहीं; सुख, सुख नहीं—
दोनों के भीतर जीवन बह रहा है।
वही जीवन ईश्वर है।
इसी को समझने का विज्ञान—
इसी को देखने का एकमात्र दर्शन—

वेदांता 2.0 Life
अज्ञात अज्ञानी

9
961 views