
यूजीसी के नए नियमों पर शोधार्थी आलोकित त्रिपाठी का तीखा हमला, सामान्य वर्ग के छात्रों के अधिकारों को बताया खतरे में
नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधार्थी आलोकित त्रिपाठी ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा हाल ही में लागू किए गए नए नियमों की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने इन नियमों को छात्रों के एक बड़े वर्ग के लिए अन्यायपूर्ण, भेदभावपूर्ण और एकतरफा करार दिया। आलोकित त्रिपाठी का कहना है कि यूजीसी के नए नियमों में सामान्य वर्ग के छात्रों को बिना किसी ठोस आधार के “स्वतः घोषित अपराधी” मानने जैसी व्यवस्था की गई है, जो न्याय के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है।
उन्होंने कहा कि इन नियमों में सामान्य वर्ग के छात्रों की सुरक्षा के लिए कोई स्पष्ट और प्रभावी प्रावधान नहीं किए गए हैं। यदि किसी छात्र पर झूठा आरोप लगाया जाता है, तो उसके सम्मान, भविष्य और शैक्षणिक जीवन की रक्षा के लिए कोई ठोस व्यवस्था दिखाई नहीं देती। इसके विपरीत, शिकायत के आधार पर तुरंत कार्रवाई का प्रावधान छात्रों को मानसिक तनाव, सामाजिक बदनामी और करियर नुकसान की ओर धकेल सकता है।
आलोकित त्रिपाठी ने विशेष रूप से इस बात पर आपत्ति जताई कि नए यूजीसी नियमों में झूठी शिकायत करने वालों के खिलाफ किसी प्रकार के दंड या कानूनी कार्रवाई का प्रावधान नहीं है। उनका कहना है कि जब किसी कानून में दुरुपयोग की संभावना को रोकने के उपाय न हों, तो वह कानून न्याय की बजाय अन्याय का माध्यम बन जाता है। ऐसे में निर्दोष छात्रों को सजा और दोषियों को प्रोत्साहन मिलने का खतरा बढ़ जाता है।
उन्होंने यूजीसी से मांग की कि नए नियमों की तत्काल समीक्षा की जाए और सभी वर्गों के छात्रों के अधिकारों, सम्मान और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए आवश्यक संशोधन किए जाएं। आलोकित त्रिपाठी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह इस यूजीसी कानून का पूर्णतः विरोध करते हैं और जब तक इसमें संतुलित व न्यायसंगत बदलाव नहीं किए जाते, तब तक छात्रों और शिक्षाविदों को एकजुट होकर इसका विरोध करना चाहिए।
लेख: ऋषभ पराशर, राष्ट्रीय अध्यक्ष, AIMA मीडिया युवा प्रकोष्ठ