logo

UGC रेगुलेशन 2026: वे 4 नियम जिन्होंने खड़ा किया राजनीतिक तूफान


​नई दिल्ली: 13 जनवरी 2026 को लागू हुए यूजीसी के नए नियमों ने शिक्षा जगत से लेकर राजनीति तक खलबली मचा दी है। जहाँ प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी के रुख को लेकर पिछड़ा वर्ग अपनी नाराजगी जता रहा है, वहीं सवर्ण संगठनों ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
​विवाद के केंद्र में ये 4 नियम:
​OBC का समावेश और नई परिभाषा (नियम 3-c): नए नियमों में पहली बार 'जातिगत भेदभाव' की परिभाषा में OBC को भी शामिल किया गया है। आलोचकों का तर्क है कि यह नियम केवल आरक्षित श्रेणियों (SC/ST/OBC) को ही 'पीड़ित' मानता है, जिससे सामान्य वर्ग के छात्रों के पास भेदभाव के खिलाफ सुरक्षा का कोई कानूनी आधार नहीं बचता।
​समता समिति (Equity Committee) का गठन: हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में एक 'इक्विटी कमेटी' बनाना अनिवार्य होगा। इसमें आरक्षित वर्गों और महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य है। विरोधियों का कहना है कि यह स्वायत्त संस्थानों में बाहरी हस्तक्षेप बढ़ाएगा।
​24 घंटे में कार्रवाई और जवाबदेही: शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर जांच शुरू करना और 15 दिनों में रिपोर्ट देना अनिवार्य है। संस्थानों के प्रमुखों को इसके लिए सीधे जिम्मेदार ठहराया जाएगा, जिसे कुछ लोग 'हड़बड़ी में की जाने वाली कार्रवाई' मान रहे हैं।
​झूठी शिकायतों पर सजा का अभाव: पिछले ड्राफ्ट में झूठी शिकायत करने वालों पर जुर्माने का प्रावधान था, जिसे फाइनल रेगुलेशन से हटा दिया गया है। सवर्ण संगठनों और प्रशांत किशोर के आलोचकों के बीच यह डर है कि इसका इस्तेमाल 'रंजिश निकालने' के लिए किया जा सकता है।
​राजनीतिक हलचल: बिहार में विपक्षी दलों का दावा है कि प्रशांत किशोर का इन नियमों पर 'मौन' या 'अप्रत्यक्ष विरोध' उनकी 'बैकवर्ड विरोधी' छवि को उजागर करता है। वहीं, जन सुराज के समर्थकों का कहना है कि पार्टी केवल नियमों के दुरुपयोग को लेकर चिंतित है।

0
0 views