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जो जी रहा है — वही सम्राट है। समाधि कोई अवस्था नहीं, वह जीवन का सहज बहाव है

जो जी रहा है — वही सम्राट है।
समाधि कोई अवस्था नहीं,
वह जीवन का सहज बहाव है।

जहाँ जीवन बह रहा है,
वहीं धर्म है।
जहाँ केंद्र में आत्मा है,
वहीं ईश्वर है।

और जहाँ मिलना, पाना, प्राप्त करना सिखाया जा रहा है—
वहीं सबसे बड़ा झूठ है।

जिसे जीवन मिल गया,
उसका कोई गुरु नहीं होता।

क्योंकि वह पूरा अस्तित्व जी रहा है—
बिना धर्म,
बिना ईश्वर,
बिना शास्त्र,
बिना गुरु।

यहाँ तक कि रिश्ते और नाते भी
उस पर बोझ नहीं बनते।

मानव आज के लिए नहीं जी रहा,
वह कल के पीछे भाग रहा है।

पर कल कभी आया नहीं,
और आएगा भी नहीं।

कल कोई स्थान नहीं,
कल कोई समय नहीं—
कल सिर्फ पृथ्वी का घूमना है।

पूरे ब्रह्मांड में खोज लो—
आज के अलावा कुछ नहीं मिलेगा।

जितना मानव बुद्धिमान बना,
उतना केंद्र से दूर गया।

केंद्र में जीवन है।
परिधि पर ज़रूरतें हैं।

जैसे अंतरिक्ष में—
जहाँ बिना साधन एक मिनट नहीं जिया जा सकता,
वैसे ही मानव जीवन में
अब ज़रूरतें अनिवार्य हो गई हैं।

पर ध्यान दो—

ज़रूरतें जिंदा रखती हैं,
जीवन नहीं देतीं।

आज मनुष्य
पूरी व्यवस्था के साथ जिंदा है—
पर जी नहीं रहा।

आईसीयू में
ऑक्सीजन है,
दवा है,
मशीन है—

पर जीवन नहीं है।

जितनी दवा बढ़ती है,
उतनी बेचैनी बढ़ती है।

क्योंकि भरोसा जीवन पर नहीं,
साधनों पर है।

और एक डर लगातार भीतर बैठा है—

“अगर आईसीयू से बाहर निकला
तो मर जाऊँगा।”

इसलिए आईसीयू ही केंद्र बन गया है।

पर आईसीयू में जीवन असंभव है।
वह व्यवस्था बीमार को बचाने की है,
जीवन को जीने की नहीं।

धर्म, गुरु, धन, पद—
सब आईसीयू के उपकरण हैं।

वे कहते हैं—

“अभी सह लो,
कल जीवन मिलेगा।”

पर जो आज जीवन नहीं देता,
वह कल क्या देगा?

अगर धर्म जीवन देता,
तो सूरज पश्चिम से उगता।

मनुष्य दुखी इसलिए नहीं है
कि उसके पास साधन नहीं—

बल्कि इसलिए कि
जीने की हिम्मत नहीं है।

हर तरफ़ बिक रहा है—

सफलता का रास्ता

साधना का उपाय

मंत्र, मोटिवेशन, कृपा, आशीर्वाद

सब जिंदा रहने के सौदे हैं।
जीवन का नहीं।

पूरा अस्तित्व—
पेड़, नदी, पशु, आकाश—
बिना गुरु, बिना धर्म,
आनंद में जी रहा है।

दुखी केवल मनुष्य है।

क्योंकि वह तुलना करता है—
और तुलना से अहंकार पैदा होता है,
जीवन नहीं।

जो व्यक्ति
आईसीयू से बाहर खड़ा है—
गुमनाम, मौन,
बिना भीड़, बिना पहचान—

उसे नास्तिक कहा जाता है,
दुश्मन कहा जाता है।

लेकिन वही आज का वास्तविक सम्राट है।

भीतर झाँकने की हिम्मत नहीं,
क्योंकि भीतर अंधेरा है।

बाहर रोशनी है—
इसलिए मानव और दूर भाग रहा है।

आज कोई नहीं कहता—

“मैं तुम्हें अभी जीवन देता हूँ।”

सब कहते हैं—

“मरने के बाद मिलेगा।”

पर जीवन कोई मरणोत्तर वस्तु नहीं।

जो अभी, यहीं,
बिना सहारे जीने की हिम्मत रखता है—
वही मुक्त है।

बाक़ी सब
आईसीयू में भर्ती हैं।

𝕍𝕖𝕕𝕒𝕟𝕥𝕒 𝟚.𝟘 𝕃𝕚𝕗𝕖
= ℕ𝕠𝕥𝕙𝕚𝕟𝕘 𝕥𝕠 𝕗𝕠𝕝𝕝𝕠𝕨,
𝕟𝕠𝕥𝕙𝕚𝕟𝕘 𝕥𝕠 𝕣𝕖𝕛𝕖𝕔𝕥,
𝕖𝕧𝕖𝕣𝕪𝕥𝕙𝕚𝕟𝕘 𝕥𝕠 𝕨𝕚𝕥𝕟𝕖𝕤𝕤.

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