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बालासाहेब ठाकरे की जन्मशताब्दी और महापौर की राजनीति: क्या उद्धव ठाकरे को मिलेगा शिवसेना का नगर नेतृत्व? एक विश्लेषण


मुंबई समेत राज्य की प्रमुख महानगरपालिकाओं में महापौर पद को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। बालासाहेब ठाकरे की जन्मशताब्दी के अवसर पर शिवसेना से जुड़े कार्यकर्ताओं और नेताओं की भावनाएं एक बार फिर उफान पर हैं। इसी बीच यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि क्या इस ऐतिहासिक साल में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना को महापौर पद मिल पाएगा।
वर्तमान राजनीतिक हालात पर नजर डालें तो तस्वीर आसान नहीं दिखती। शिवसेना दो गुटों में बंटी हुई है और नगर निगमों में सत्ता का गणित गठबंधन और संख्या बल पर टिका है। महापौर का चुनाव सीधे जनता नहीं, बल्कि नगरसेवकों के मत से होता है। ऐसे में भावनात्मक अपील से ज्यादा अहम भूमिका आंकड़ों और राजनीतिक समझौतों की रहती है।
उद्धव ठाकरे खुद महापौर पद के दावेदार नहीं होते, लेकिन उनकी पार्टी के लिए यह पद राजनीतिक और प्रतीकात्मक रूप से बेहद अहम माना जाता है। बालासाहेब ठाकरे की जन्मशताब्दी को देखते हुए शिवसेना (उद्धव गुट) के समर्थकों का मानना है कि यह पद पार्टी को मिलना चाहिए। उनका तर्क है कि मुंबई पर शिवसेना की ऐतिहासिक पकड़ रही है और इस साल उस विरासत को सम्मान मिलना चाहिए।
वहीं दूसरी ओर, सत्ता पक्ष और अन्य दल भी महापौर पद पर अपना दावा मजबूत करने में जुटे हैं। कई नगर निगमों में किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत न मिलने की स्थिति में जोड़तोड़ की राजनीति तेज हो गई है। ऐसे में कांग्रेस, एनसीपी और अन्य क्षेत्रीय दलों की भूमिका भी निर्णायक मानी जा रही है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि जन्मशताब्दी का भावनात्मक असर जरूर है, लेकिन अंतिम फैसला राजनीतिक गणित पर ही निर्भर करेगा। अगर उद्धव ठाकरे की शिवसेना आवश्यक समर्थन जुटाने में सफल होती है, तो महापौर पद का सपना साकार हो सकता है। फिलहाल स्थिति अनिश्चित बनी हुई है और आने वाले दिनों में होने वाली राजनीतिक बातचीत पर सभी की नजरें टिकी हैं।

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