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निंदा ज्ञान, नहीं निदान

*यथार्थ ज्ञान, चरितार्थ ध्यान*
सिर्फ़ शोर मचाना क्रान्ति नहीं,
सिर्फ़ ज़ख़्म दिखाना ज्ञान नहीं।
जो रोते-रोते थक जाए जन,
वो राह दिखाना काम नहीं।
महान वही जो दीप बने,
अँधेरों को पहचान करे,
जो समस्या बोले निर्भीकता से
और समाधान का विधान करे।
हमें नहीं चाहिए भाषण खोखले,
ना आँसू भरी हुंकारें।
हमें चाहिए वो हाथ मज़बूत,
जो गिरे हुए को उबारें।
जो कहे—“हाँ, ये दर्द सही है”,
फिर पूछे—“अब क्या करना है?”
जो हर पीड़ा को नीति बनाए,
हर प्रश्न का उत्तर रचना है।
जन क्रान्ति वो नहीं जो तोड़े,
जन क्रान्ति वो है जो गढ़े।
जो टूटे मन में साहस भरे,
जो बिखरे समाज को जोड़े।
ज्ञान वही जो कर्म बने,
कर्म वही जो परिवर्तन लाए।
सिर्फ़ समस्या बताना नहीं,
समाधान जो ज़मीन पर उतर जाए।
उठो! विचार को औज़ार बनाओ,
संकल्प को पहचान दो।
महान ज्ञान का यही पैगाम—
बात नहीं, समाधान दो।
अगर चाहें तो मैं इसे
जय भारत,
जय संविधान।

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