*वित्त व्यवस्था को ख़तरनाक रास्ते पर धकेला जा रहा है*
*(आलेख : प्रभात पटनायक, अनुवाद : राजेंद्र शर्मा)*
*प्रकाशनार्थ*
*वित्त व्यवस्था को ख़तरनाक रास्ते पर धकेला जा रहा है*
*(आलेख : प्रभात पटनायक, अनुवाद : राजेंद्र शर्मा)*
भाजपा-नीत सरकार ने अभी पिछले ही दिनों संसद से एक कानून बनवाया है, जो भारत के बीमा क्षेत्र में 100 फीसद तक विदेशी हिस्सा पूंजी की स्वामित्व की इजाजत देता है। प्रधानमंत्री ने एलान किया है कि यह भारत के वित्तीय क्षेत्र में एक बड़े ‘सुधार’ की शुरुआत का सूचक है। अनुमान लगाया जा सकता है कि यह कथित सुधार हमारी वित्तीय संस्थाओं में और ज्यादा निजी स्वामित्व का— जिसमें विदेशी स्वामित्व भी शामिल है — रास्ता खोले जाने की ही दिशा में जाएगा। निस्संदेह यह इस क्षेत्र के प्रति, स्वतंत्रता के बाद के दौर में अपनायी गयी नीति के उल्लेखनीय रूप से पलटे जाने का ही सूचक है।
*आज़ादी के बाद की राह को पलटने की ओर*
आईएमएफ, विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय वित्त की विभिन्न अन्य एजेंसियां और अमेरिकी प्रशासन, लंबे अर्से से वित्तीय क्षेत्र के प्रति नीति में इस तरह के बदलाव की मांग करते आ रहे थे। वास्तव में अमेरिकी सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने तो भारत सरकार को यह सुझाव भी दिया था कि चाहे फौरन समूचे वित्तीय क्षेत्र का निजीकरण संभव नहीं हो, सरकार सिर्फ भारतीय स्टेट बैंक का निजीकरण करने के जरिए, इस तरह का ‘एक संकेत तो दे ही सकती’ थी। बहरहाल, नव-उदारवादी ‘सुधारों’ के अपने शौक के बावजूद, कांग्रेस-नीत सरकार इस ख्याल से ही ठिठक गयी। लेकिन भाजपा, जो कि भारतीय कॉरपोरेट स्वार्थों की और भी निर्मम चाकर है, जबकि इन स्वार्थों का अब वैश्वीकृत पूंजी के स्वार्थों के साथ कमोबेश मेल ही बैठ चुका है, साम्राज्यवादियों के मांगे इन ‘सुधारों’ को लागू करने की तैयारियां कर रही है। यानी वित्तीय क्षेत्र को निजीकरण तथा विदेशी प्रभुत्व की उसी दिशा में धकेला जा रहा है, जिस रास्ते से उसे स्वतंत्रता के बाद छुड़ाया गया था।
और वित्तीय क्षेत्र को इस रास्ते से छुड़ाए जाने के बहुत पुख्ता कारण थे और इन कारणों की पड़ताल करना उपयोगी हो सकता है। पहला तो यही कि वित्तीय बाजार, ‘उत्पादन’ और ‘सट्टे’ में भेद नहीं करते हैं। इन दोनों के बीच के अंतर को इस प्रकार समझा जा सकता है। अगर किसी परिसंपत्ति को ‘रखने’ के लिए यानी इससे समय के साथ आय के जिस प्रवाह का अनुमान है, उसके लिए खरीदा जाता है, तो इसे ‘उत्पादन’ के लिए खरीदना कहा जाएगा। लेकिन, अगर किसी परिसंपत्ति को इसी उद्देश्य से खरीदा जाता है कि उसे जल्द ही बढ़े हुए दाम पर बेच दिया जाए, उस स्थिति में खरीददार की उस परिसंपत्ति से आने वाली आय में तथा इसलिए इससे हासिल होने वाले उत्पादन की धारा में कोई दिलचस्पी नहीं होती है। इसे ‘सट्टाबाजारी’ कहते हैं। चूंकि निजी वित्तीय संस्थाएं, जो पूरी तरह से मुनाफे के ख्याल से ही संचालित होती हैं, इन दो अलग-अलग प्रकार की गतिविधियों में अंतर ही नहीं करती हैं और इसलिए अपने संसाधनों का एक हिस्सा, उत्पादन की बलि देकर सट्टेबाजी में फंसाए रखती हैं, तीसरी दुनिया की कोई भी अर्थव्यवस्था शायद ही कभी इस तरह का रास्ता लेना चाहेगी।
*संतुलित विकास के लिए राजकीय स्वामित्व ज़रूरी*
दूसरे, उत्पादन के दायरे में भी, निजी वित्तीय संस्थाएं ऋण देने के मामले में, सुव्यवस्थित तरीके से विभिन्न ऋण-ग्राहकों के बीच अंतर करती हैं। औपनिवेशिक दौर में, जब भारतीय उद्यमी बैंकों के पास ऋण लेने के लिए जाते थे, ये बैंक चूंकि बहुत हद तक विदेशी स्वामित्व में थे, वे भारतीय उद्यमियों के साथ व्यवस्थित तरीके से भेदभाव किया करते थे। वक्त के साथ, भारतीय कारपोरेट घरानों ने अपने बैंक स्थापित कर लिए, ताकि अपने कारोबारों के लिए वित्त जुटा सकें। लेकिन, वे खुद अन्य ऋण-ग्राहकों को ऋण के दायरे से बाहर रखते थे। खासतौर पर छोटे उत्पादकों, किसानों, दस्तकारों और ऐसे ही अन्य तबकों को, संस्थागत वित्त के इन स्रोतों के दायरे से बाहर ही रखा जाता था।
चूंकि वित्त, पूंजी पर नियंत्रण को प्रदर्शित करता है, इस वित्त का किस प्रकार से वितरण होता है यानी यह वित्त किसे मिलता है, किन क्षेत्रों में यह वित्त जाता है, किन गतिविधियों के लिए इस वित्त का उपयोग होता है, उससे देश में विकास की दर और विकास का पैटर्न तय होता है। और चूंकि निजी वित्तीय संस्थाएं व्यवस्थित तरीके से बहिष्करण का सहारा लेती हैं और कुछ खास क्षेत्रों को तथा संंबंधित क्षेत्रों में सक्रिय उत्पादकों को ऋण के दायरे से बाहर रखा जा रहा होता है, यह न सिर्फ विकास के पैटर्न को विकृत करने का काम करता है, बल्कि विकास को बाधित भी करता है।
इसका अर्थ यह हुआ कि अगर वित्त को सट्टेबाजी के बजाए उत्पादन के लिए ही लगाया जाना है, अगर उसे कृषि तथा लघु उत्पादन जैसे क्षेत्रों के विकास के लिए लगाया जाना है, तो वित्तीय संस्थाओं पर निजी स्वामित्व की व्यवस्था, इस काम को पूरा करने में पूरी तरह से अक्षम है। इस काम के लिए यानी एक ऐसा आर्थिक विकास करने के लिए, जो संतुलित हो तथा कुछ खास सामाजिक प्राथमिकताओं को पूरा करता हो, वित्तीय संस्थाओं पर राजकीय स्वामित्व जरूरी हो जाता है।
*राजकीय स्वामित्व ने वित्तीय संकट से बचाया*
यही बुनियादी अंतर्दृष्टि थी, जो ‘नव-उदारवादी’ सुधारों के आने से पहले तक के भारतीय विकास यात्रा-पथ के पीछे रही थी। इसी के चलते 1955 में इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया का राष्ट्रीयकरण किया गया था ; 1956 में जीवन बीमा कारोबार का राष्ट्रीयकरण किया गया था ; 1969 में 14 बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था और 1980 में छह अन्य निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था। वित्तीय क्षेत्र पर राजकीय स्वामित्व की दिशा में इसी बदलाव का एक और नतीजा, कृषि की ओर अभूतपूर्व तरीके से संस्थागत वित्त का प्रवाह होने के रूप में सामने आया था और इसी ने हरित क्रांति को और खाद्यान्न के मामले में भारत की आत्मनिर्भरता को संभव बनाया था। साठ के दशक के आरंभ में भारत, अमेरिका से खाद्यान्न के आयात पर निर्भर हो गया था और इस तरह अमेरिकी साम्राज्यवाद के हथकंडों के लिए वेध्य हो गया था। इसी संदर्भ में भारत का खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल करना एक उल्लेखनीय कारनामा था, जिसे पलटवाने की साम्राज्यवाद की कोशिशें आज तक जारी हैं।
यह भी वित्तीय क्षेत्र में राजकीय स्वामित्व की प्रधानता का ही नतीजा था कि जब अमेरिका में आवासन का बुलबुला फूटा था और पूंजीवादी दुनिया की समूची वित्त व्यवस्था संकट में चली गयी थी, उस समय भारत उन चंद देशों में था, जो इस संकट से कमोबेश अछूते रह गए थे। आईसीआईसीआई बैंक के अपवाद को छोडक़र, भारतीय बैंकों के पोर्टफोलियो में विदेशी परिसंपत्तियां बहुत थोड़ी ही थीं और शायद ही कोई विषाक्त परिसंपत्तियां रही होंगी। इस तरह राजकीय स्वामित्व ने करोड़ों जमाकर्ताओं की जमाराशियों को खतरे में पड़ने से बचा लिया था।
आर्थिक उदारीकरण ने एक हद तक, भारत की वित्तीय व्यवस्था के स्वास्थ्य को, पहले के मुकाबले कमजोर कर दिया है। बेशक, किसानी-खेती में सीधे लगने वाले संस्थागत वित्त का परिमाण बहुत ही घट गया है और तरह-तरह के बिचौलिये निकल कर आ गए हैं, जो बैंकों से ऋण उठाते हैं और फिर यही पैसा कहीं ज्यादा ब्याज पर और वास्तव में अनाप-शनाप ब्याज पर, किसानों को मुहैया कराते हैं। लेकिन, भाजपा-नीत सरकार तो इस क्षेत्र की बची-खुची स्वस्थता को भी खत्म कर देना चाहती है और वह ऐसा करना चाहती है, भारतीय वित्तीय क्षेत्र के निजीकरण तथा उसमें विदेशी दबदबे की प्रक्रिया को तेज करने के जरिए।
*निजीकरण की खोखली दलीलें*
बीमा क्षेत्र में विदेशी हिस्सा पूंजी की अधिकतम सीमा को खत्म ही करने के लिए सरकार की ओर से जो दलीलें दी जा रही हैं, उन पर शायद ही कोई विश्वास करेगा। एक दलील तो यही है कि इससे बीमा क्षेत्र में और ज्यादा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आएगा और इससे बीमा सुरक्षा की पहुंच तथा गुणवत्ता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी। लेकिन, अगर भारतीय बीमा उपभोक्ताओं से जमा किए जाने वाले पैसे का उपयोग विदेश में सट्टा बाजारों के उद्यमों में ही किया जा रहा होगा, तब तो इससे न तो भारत के विकास में कोई मदद मिलने वाली है और न ही उपभोक्ताओं की सुरक्षा को बढ़ाने में। इसी प्रकार इस दावे में भी दम नहीं है कि इसके चलते उपभोक्ता अब सोने तथा अचल संपत्ति जैसी परिसंपत्तियों में अपनी दौलत रखने के लिए प्रेरित नहीं होंगे बल्कि अपनी दौलत बीमा पॉलिसियों में रखेंगे और यह वित्त को उत्पादक कार्यों की ओर ले जाने का काम करेगा। लेकिन, इस दलील का तब क्या अर्थ रह जाएगा जब, जिसकी कि ज्यादा संभवना है, इस वित्त को सट्टाबाजाराना उद्देश्यों की ओर मोड़ा जा रहा होगा या उसका उपयोग, अपने से छोटे उद्यमों का अधिग्रहण करने या मुनाफों का हिस्सा बढ़ाने तथा इस प्रक्रिया में मुद्रास्फीति को भड़काने के जरिए, इजारेदारियों की सेवा करने के लिए किया जा रहा होगा।
बेशक, हो सकता है कि सरकार यह उम्मीद लगाए बैठी हो कि उसके इस बीमा ‘सुधार’ से भारतीय अर्थव्यवस्था में अंतर्राष्ट्रीय वित्त के खिलाडिय़ों का ‘भरोसा’ बढ़ेगा और इस तरह वित्त का इस समय जो पलायन हो रहा है, जिसने भारतीय रुपए को एशिया की सबसे कमजोर मुद्रा बना दिया है, उसे थामने में मदद मिलेगी। लेकिन, इस वित्तीय पलायन का मुख्य कारण तो डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय मालों पर बहुत भारी टैरिफ लगाना ही है। ये टैरिफ लगाए जाने से रुपए के मूल्य के गिरने की अपेक्षाएं पैदा होती हैं, जोकि वास्तव में इस तरह की गिरावट में योगदान करता है। इसलिए, भारत के वित्तीय क्षेत्र का चाहे जितना भी उदारीकरण कर दिया जाए, इससे वित्त का यह पलायन तब तक रुकने वाला नहीं है, जब तक कि ट्रंप लूट की मांग पूरी नहीं हो जाती है यानी उसे फायदा पहुंचाने के लिए अन्य चीजों के अलावा भारतीय अर्थव्यवस्था के दरवाजों को अमेरिकी दुग्ध उत्पादों के और खुले आयात के लिए खोल नहीं दिया जाता है। भाजपा-नीत सरकार, जिसे किसान पहले भी एक बार सबक सिखा चुके हैं, किसानों को नाराज करने में हिचक रही है। लेकिन, वित्तीय क्षेत्र के दरवाजे खोलने के रूप में ट्रंप को खुश करने के लिए, उस पर चाहे कितने ही चढ़ावे क्यों न चढ़ाए जाएं, उसकी भूख शांत होने वाली नहीं है और वित्त का पलायन रुकने वाला नहीं है।
वास्तव में, वित्तीय क्षेत्र के दरवाजे बहुराष्ट्रीय निगमों तथा निजी खिलाड़ियों के लिए खोले जाने का तो उल्टा ही असर होगा। इससे तो और भी ज्यादा वित्तीय पलायन का ही रास्ता खुल जाएगा और इसलिए यह कदम, रुपए की गिरावट को रोकने की नजर से, ओंधा ही साबित होगा।
*ट्रंप के आगे समर्पण के रास्ते पर*;
यह इसी को दिखाता है कि भारत में नव-उदारवाद पर चले जाने ने, अपनी आखिरी सीमाओं को छू लिया है। नव-उदारवाद ने किसानों और लघु उत्पादकों पर, भारी कठिनाइयां लादी हैं। अब ट्रंप यह मांग कर रहा है कि उनकी इन कठिनाइयों को और बढ़ाया तथा गहरा बनाया जाना चाहिए। भारत अगर ऐसा करने से इंकार करता है, तो तात्कालिक रूप से उसके लिए दूसरा रास्ता यही है कि अपनी मुद्रा के पहले ही गिरते मूल्य में और भी गिरावट के लिए तैयार रहे, जो कि मुद्रास्फीति को भडक़ाएगा और अंतत: भारत को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की सरपरस्ती में आने के लिए मजबूर कर देगा, जैसा कि दक्षिण एशिया के हमारे दूसरे कई पड़ौसियों के साथ हुआ है।
पर नुक्ता यह नहीं है कि भारत को, इन दो विकल्पों में से किस का चुनाव करना चाहिए। नुक्ता यह है कि उन हालात से ही बाहर निकला जाए, जो भारत के विकल्पों को, उक्त दो विकल्पों तक ही सीमित कर देते हैं। और यह तभी हो सकता है, जब ट्रंप की भभकी का जवाब, अमेरिकी मालों पर भारी टैरिफ लगाने और वित्तीय प्रवाहों पर नियंत्रण लगाने के जरिए दिया जाए। बेशक, इसके लिए नीति के स्तर पर प्रतिमान परिवर्तन की और नव-उदारवाद को छोड़कर, और ज्यादा आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने की जरूरत होगी। लेकिन, भाजपा-नीत सरकार में इस तरह के साहसपूर्ण निर्णय करने का दम ही नहीं है। इसके बजाए वह तो अंतत: ट्रंप के सामने अपने समर्पण को ढांपने के लिए, फासीवादी तरीकों का सहारा लेने का ही रास्ता अपनाने जा रही है।
*(लेखक दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आर्थिक अध्ययन एवं योजना केंद्र में प्रोफ़ेसर एमेरिटस हैं। अनुवादक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका 'लोकलहर' के संपादक हैं।)*
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